गुरुवार, जून 01, 2017

या मौला यूं तोड़ दे मुझको कि मैं बिखर जाऊँ..!!

या मौला यूं तोड़ दे मुझको कि मैं बिखर जाऊँ
कांच बनके  ना चुभं, खशबू सा इधर उधर जाऊं

तेरे गम में मैं रह रह कर जलूं चरागों की तरह
परवाने की तरह शम्मा से लिपट कर मर जाऊं

तेरी चाहत में मैं सब रास्ते भूल कर भटकूं
मैं इस तरह भटकूं कि अब अपने घर जाऊं

राह तुझसे खुले और राह तुझपे ही बंद हो जाए
तू मुझको बता मैं अब जाऊं भी तो किधर जाऊं

तेरी उल्फत वो ऐब है जिस्म में लहू सा बहता है
सुधर जाए जो ऐब मेरा, तो मैं भी अब सुधर जाऊं

तुम्हारा-अनत  

मंगलवार, मई 30, 2017

जिसने दिया है दर्द अब दवा भी वही करे ...!!

जिसने दिया है दर्द अब दवा भी वही करे
बद्दुआ दी है जिसने अब दुआ भी वही करे

जिसने लगा के आग, है रोशन किया जिगर
मेरे आँखों के सामने भरम का धुंआ भी वही करे

मेरे भीतर के पानी को प्यास जिसने है कर दिया
मेरी प्यास के भीतर अब एक कुआँ भी वही करे

जो मेरा सबकुछ हो गया और कुछ हुआ भी नहीं
मेरी तन्हाइयों के भीतर अब हुआ भी वही करे

जिसने हमें "अनंत" ताश के पत्तों सा कर दिया
खेल कर वो हमसे अब हमें जुआँ भी वही करे

तुम्हारा-अनंत



सोमवार, मई 22, 2017

मेरी शायरी में गूंजती एक अनकही पुकार है...!!

तुम मंज़िलों पे निसार थे, हमें रास्तों से प्यार है
तुम्हारा दिल चमन चमन, हमारा दिल गुबार है

वो दिल की जिसमे तुम थे, वो दिल की जिसमें इश्क़ था
वो दिल भी अब उजाड़ गया, वो दिल भी अब फ़िगार है

बिक रहीं है दिलों की हसरतें, बिक रहें है नज़र के ख्वाब भी
यहाँ हर तरफ हैं तिज़ारतें, यहाँ हर तरफ एक बज़ार  है

जो इश्क़ यहाँ पे जुर्म है, जो शायरी यहाँ गुनाह है
मेरी हर धड़कन इश्क़ है, मेरी हर सांस गुनहगार है

तुम सुन रहे हो कि नहीं, मुझे नहीं पता "अनंत"
पर मेरी शायरी में गूंजती एक अनकही पुकार है

तुम्हारा-अनंत 

रविवार, मई 21, 2017

मैं तेरे दिल में रहूँगा, एक ख्याल की तरह...!!

मैं तेरे दिल में रहूँगा, एक ख्याल की तरह
मैं तेरे ज़हन से उठूँगा, एक सवाल की तरह

तू नहीं है मेरी ज़िन्दगी में तो क्या ग़म है
मैं तेरी ज़िन्दगी में रहूँगा एक मलाल की तरह

मैं इस तल्ख़ हक़ीक़त के सियाह चेहरे पर
अपने ख़्वाब मल रहा हूँ, गुलाल की तरह

तुम्हारी याद से बुनी शायरी की ये चादर
मैंने ओढ़ रखी है जिस्म पे खाल की तरह

लहू से लाल है मेरा  ये चाक़ जिगर
किसी आशिक़ के थप्पड़ खाए हुए गाल की तरह

ज़िन्दगी तुम्हारी यादों के क़दमों से यूं लिपटी रही
जैसे घोड़े के क़दमों में जड़ी हो नाल की तरह

उससे बिछड़ कर ज़िन्दगी यूं बसर हुई "अनंत"
ज्यों हर एक सांस गुजरी हो किसी बवाल की तरह

तुम्हारा-अनंत


बुधवार, मई 17, 2017

मैंने सहरा का दिल टटोल कर देखा है...!!

मैं  जिसके इश्क़ में मोमिन हुआ था
वो यार मेरा, एक काफ़िर सनम था

मैंने सहरा का दिल टटोल कर देखा है
वहाँ एक हिस्सा आंसुओं से नम था

मैं आज जो ये शायर सा हो गया हूँ
ये कल मुझपे उसका किया करम था

उसने मेरा नाम लेकर आहें भरीं थीं
क्या ये होना मेरे वास्ते कम था

मैं उसके बिना भी ज़िन्दगी गुज़ार सकता हूँ
ये मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा भरम था

वो ख्वाब नहीं था जो अभी अभी टूटा है
वो आँखों पे सजा सबसे खूबसूरत वहम था

तुम जिसे हादसा कह रहे हो "अनंत"
वो मुझपे किया ख़ुदा का एक रहम था

तुम्हारा-अनंत

मंगलवार, मई 16, 2017

मैं तेरी याद में टूट कर बिखरना चाहता था...!!

तू मेरी ग़ज़ल थी मैं तुझे लिखना चाहता था
मैं हूबहू तुझ जैसा दिखना  चाहता था

वक़्त ने मुझको पत्थर बना दिया वार्ना
मैं अक्सर से झरनों सा बहना चाहता था

एक  बात है जो मैं अब किसी से कह ना सकूंगा
वो बात मैं तुझसे, बस तुझसे कहना चाहता था

कुछ मजबूरियाँ थीं, जो मैं ढह ना सका अबतक
वार्ना मैं एक कच्चे मकान सा ढहना चाहता था

मैं  तेरे इश्क़ में बंजारे का बंजारा ही रह गया
मैं तेरे दिल के किसी कोने में बसना चाहता था

मैं नहीं ठहरा, ठहरता तो मर गया होता
पर मैं दो घड़ी ठहर कर मरना चाहता था

मेरी कहानी हदों के मारे आदमी की कहानी है
मैं आदमी होने की सारी हदों से गुजरना चाहता था

तुमसे किए वादे मेरी बेकरारी का बाईस हैं
मैं तुझ जैसा वादों से मुकरना चाहता था

ना जाने क्या वजह है "अनंत" साबूत बचा हूँ मैं
मैं तेरी याद में टूट कर बिखरना चाहता था

तुम्हारा-अनंत

शुक्रवार, मई 12, 2017

ये सारे के सारे ग़म गुम हो गए होते...!!

जो कभी तुम मैं और मैं तुम हो गए होते
ये सारे के सारे ग़म गुम  हो गए होते

ज़िन्दगी एक हादसा थी पर हमने माना ही नहीं
जो मान लिया होता तो गुमसुम हो गए होते

हम चलते रहे हैं, जेठ की दुपहरी की तरह
जो ठहरे होते तो फागुन हो गए होते

तेरी मोहब्बत में हम दाग-दाग ही रहे
जो तुझसे नफरत होती तो साबुन हो गए होते

नहीं टूटे सो ज़िन्दगी के लुहार की ठनक हैं
बिखर कर मौत के पायल की झुनझुन हो गए होते

तुम्हारा अनंत  

सोमवार, मई 01, 2017

तुम मेरे दिलो-जॉ से उतर क्यों नहीं जाते

तुम मेरे दिलो-जॉ से उतर क्यों नहीं जाते
किसी ख्वाब की तरह टूट कर बिखर क्यों नहीं जाते

क्या बताऊँ अक्सर क्यों चले जाते हैं परिंदे
खड़े रहते हैं वहीँ, और कहीं शज़र नहीं जाते

तुम्हारी याद के मारे कई अजनबी मेरे भीतर  रहते है
मर मर कर जीते हैं  कमब्खत मर नहीं जाते

कुछ मुसाफिर हैं जो मुसलसल सफर में ही हैं
वो हर जगह जाते हैं मगर घर नहीं जाते

मैं तबतक शायर हूँ, जबतक जिन्दा हूँ
मैं तबतक जिन्दा हूँ,  जबतक ज़ख्म ये भर नहीं जाते

अनुराग अनंत



बुधवार, अप्रैल 26, 2017

जरुरी तो नहीं....!!

जो चाहो तुम्हे मिल जाए जरुरी तो नहीं
हर बार कोई तुम्हे बचाये जरुरी तो नहीं

अपने हिस्से का खुद ही रो लो तो बेहतर है
कोई तुम पे  भी अश्क़ बहाए जरूरी तो नहीं

कुछ ज़ख्म बहुत जरुरी है जिगर पर रहना
कमब्खत हर ज़ख्म भर जाए जरुरी तो नहीं

मैं ग़मज़दा हूँ तो मुझे ग़मज़दा ही रहने दो
कोई रोते हुए भी मुस्कुराए जरुरी तो नहीं

 कुछ बात है जो छिपाने को जी चाहता है
हर बात बता ही दी जाए जरुरी तो नहीं

मौत का लुत्फ़ उठा कर भी देखिये अनंत
जिंदगी ही हर मजा दे जाए जरुरी तो नहीं

अनुराग अनंत 

मुझे मौत की सख्त जरूरत है..!!

ये नींद अब मुझे सुला ना पाएगी
मुझे मौत की सख्त जरूरत है

जिंदगी हसीन है ये किसने कहा
मुझे इस जिंदगी से नफरत है

जो मेरी जान की जानी दुश्मन है
कम्बख़त उस शै का नाम उल्फत है

जितना जिया हूँ सब गुस्ताखी है
जितना जी रहा हूँ मेरी जुर्रत है

ये सांस क्योंकर बंद नहीं होती
ये मेरी जान पर अजीब आफत है

दो घडी रुको मैं रोना चाहता हूँ
क्या मुझे मैं होने की मोहलत है

अनुराग अनंत

मैं अपने ज़ख्मो पर ज़ख्म लगाता हूँ

ये शायरी मेरी जान की दुश्मन है
मैं जिसे मर मर कर गले लगाता हूँ

तुम जख्मो पर मरहम लगाते होगे
मैं अपने ज़ख्मो पर ज़ख्म लगाता  हूँ

तुम अपने होने पर कितना इतराते हो
मैं अपने होने से कितना घबराता हूँ

तुम जब मुझे जीने की दुआएं देते हो
मैं कुछ हल्का-हल्का सा मर जाता हूँ

एक नींद भीतर बहुत दिनों से जगती है
मैं उसको बाहर से रोज़ सुलाता हूँ

मैं रोज़ एक क़त्ल का आदी हूँ
मैं रोज़ खुद का गला दबाता हूँ

तुम्हारा - अनंत

शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2017

दर्द का ये पापी पर्वत जो गल जाता तो बेहतर था..!!

सपनों जैसा कोई अपना मिल जाता तो बेहतर था
सर मंडराता ये खतरा जो टल जाता तो बेहतर था

एक हिमालय भारी भारी छाती पे लिए घूम रहा हूँ
दर्द का ये पापी पर्वत जो गल जाता तो बेहतर था

इस सूरज की तेज तपिश में सब कुछ पिघल रहा है
नफरत वाला ये सूरज जो ढल जाता तो बेहतर था

इक रावण है, जो तेरे भीतर, मेरे भीतर हँसता है
किसी दशहरे ये रावण भी जल जाता तो बेहतर था

इश्क़ की छलिया गली में हम ये ख्याल लिए टहलते हैं
कोई मासूम सा छलिया हमको भी छल जाता तो बेहतर था

वो जो मुझको उसका रातों-दिन लाशों पे हँसना खलता है
तुमको भी कभी किसी का मरना खल जाता तो बेहतर था

अनुरग अनंत