मंगलवार, दिसंबर 30, 2014

मैं एक ज़ंग में था और ज़ंग का सामान नहीं था..!!

उसे भुला कर जीना इतना भी आसान नहीं था
मैं एक ज़ंग में था और ज़ंग का सामान नहीं था

वो जो गया, मेरा सब कुछ साथ ले गया अपने
मेरे पास मेरी जमीं नहीं थी, मेरा आसमान नहीं था

उसका मिलना मेरे खातिर, एक परेशानी का सबब रहा
मैं पहले भी परेशान था, पर इतना भी परेशान नहीं था

अहले सियासत तूने मुझे नांदानियत का इल्म करा दिया
मैं जिसे नांदान समझता था, वो इतना भी नांदान नहीं था

दुनिया को दस्त में ले, जो जिंदगी भर बेलौस ही जीया
कलंदर था वो “अनंत”, उसे इस बात का गुमान नहीं था

अहले-आलम मुसलसल भरते रहे आह, मेरे ग़म-ओ-दर्द पर
कम्बखत एक शख्स भी, मेरे आंसुओं से अनजान नहीं था

--अनुराग अनंत

बुधवार, दिसंबर 24, 2014

देह को बेदी करके हमने, रूह का हवन किया है..!!

तुझे भुलाने को हमने क्या क्या जतन किया है
देह को बेदी करके हमने, रूह का हवन किया है

सांस-सांस मरघट बोला है, धड़कन में अवसाद हंसा है
जिन यादों ने मुझको मारा, उनको खुद में दफ़न किया है

तुझको ओढा था, तुझे बिछाया, पहरन, गहना तुझे बनाया
तेरे जाने के बाद हमने, दिल के सूनेपन को कफ़न किया है

तूने जब जब हम पर वार किया, हमने हंस कर टाल दिया है
ए कातिल तेरे हर वार का हमने, अपने दिल पर वरन किया है

अश्क हमारे बेबस ठहरे, कुछ कह न पाए, रह रह ढुलके
दर्द जो गहराया दिल में तो हमने उसको सुखन किया है

-अनुराग अनंत

या तो खुदा की रहमत थी, या फिर जीने का हुनर था..!!

ये उलझन, ये बेबसी, ये मसायल, ये तगाफुल
मैं सोचता हूँ तुमसे न मिला था, तभी बेहतर था

तुमने मिल के कुछ यूं छुआ कि खिजां हो गया मैं
तुम न थे जिंदगी में तो, मैं एक सब्ज शजर था

क्या दिया, क्या लिया तुमने, जो हिसाब करता हूँ
हर तरफ आवाज उठती है, वो एक बेसबब सफ़र था

गज़ब है कि तुम्हारे साथ रहे और बचे भी रहे अब तक
या तो खुदा की रहमत थी, या फिर जीने का हुनर था

तुम्हारी हर अदा, मोहब्बत, इश्क़-ओ- फिकर की बातें
अब समझ में आता है कि वो तो साजिशों का कहर था

यूं लुटते रहे तुमसे और निभाते भी रहे अब तक
रेशमी इश्क़ था तुमसे, ये उस रेशम का असर था

-अनुराग अनंत 

रविवार, मार्च 23, 2014

एक ख्वाब है !!

एक ख्वाब है जो मुझे कभी जीने नहीं देता
एक ख्वाब है जो मुझे कभी मरने नहीं देता 

डर कर जीता, तो वजीर-ए-निजाम हो सकता था 
न जाने क्या है भीतर, जो मुझे कभी डरने नहीं देता

ये वो सड़क है जहाँ बड़े-बड़े साहिब-ए-किरदार गिर पड़े 
जिन्दा है मेरा ईमान वो मुझे कभी गिरने नहीं देता 

समंदर के किनारे एक गरौंदा, जो बेख़ौफ़ खड़ा मिला 
एक बच्चे हंस कर कहा, मैं इसे कभी बिखरने नहीं देता

सियासत के बाज़ार में तेज़ाब बिकता रहा, बांटता रहा
ये तेज़ाब मोहब्बत को कभी सजने-सँवरने नहीं देता

चाहता तो वो भी है कि रहे घर-ओ-वतन में सुकून से
पर भूख का कहर उसे घर में कभी ठहरने नहीं देता.

तुम्हारा- अनंत

बुधवार, जुलाई 24, 2013

कुछ चंद लोग छाए हैं बहार की तरह..

कुछ चंद  लोग छाए हैं बहार की तरह
बहुत से लोग दफ़न हैं मजार की तरह

सजी है अदालत, मेरे क़त्ल का मुकादमा है
और मैं ही खड़ा हूँ, कटघरे में गुनाहगार की तरह

ए जिंदगी, तू मुझे मौत देगी, मैं जनता हूँ ये
पर मैं लड़ कर मारूंगा, एक सिपहसालार की तरह

जब-जब ज़रूरत पड़ी, तुमने मुझे निकाल लिया
मैं तुम्हारी म्यान में रहा सदा, तलवार की तरह

आज-कल मुझमे महज़ शोर बसता है
मेरे भीतर कुछ पनप रहा है बाज़ार की तरह

जब याद आती है उसकी,सच कहता हूँ मैं
ये दिल सुलग उठता है, अंगार की तरह

मेरे ख़्वाब मुझ तक अब आ नहीं पाते
रोटी की फिकर खड़ी है,दिवार की तरह

ये वक्त हमें क्या, मिटा पायेगा  "अनंत"
हम इसके दिल में बसे है,प्यार की तरह

तुम्हारा--अनंत

मंगलवार, मई 29, 2012

पुराने यारों की याद..............

जब पुराने यारों की याद आती है
इक अजीब सी कसक कसकसाती है

वो चौराहों का हो-हल्ला गूंज जाता है
 वो नुक्कड़ के मिश्रा की चाय याद आती है

कालेज की दीवारों पर लिखे हैं नाम अब तक
निकलता हूँ जब उधर से निगाहें दौड़ जातीं है

पुरानी डायरी के पन्नों पर लिखी मेरी गज़लों से
कालेज के बरामदे मे टहलते दोस्तों की आवाज़ आती है

खनकती है सुषमा और अनुश्री चहकती है
संदीप,भास्कर और अनंत की तिकड़ी मुसकुराती है

पहले तो चले आते थे मेरे यार, मेरे साथ घर तक
अब तो महज मेरे साथ मेरी तनहाई आती है

तुम्हारा--अनंत

एक अजब ज़ंग लड़ता हूँ,..........

मैं रात-ओ-दिन एक अजब ज़ंग लड़ता हूँ
मैं अपने लहू से अपनी गजल गढ़ता हूँ

वो बेवफा हो गया तो क्या हुआ ''अनंत''
मैं उसके खातिर अब तलक दिल मे वफा रखता हूँ

वो मिलता है तो मुँह पर दुआ और दिल मे मैल होती है
मैं जब भी मिलता है ,दिल आईने सा सफा रखता हूँ

शायद यही वजह है जो इस घाटे के दौर मे भी
मैं यारों की दौलत और मोहब्बत का नफ़ा रखता हूँ

जला है जब से नशेमान मेरा मैं नशे मे हूँ
अब हर वक़्त बस मैं इंसानियत का नशा रखता हूँ

तुम्हारा---अनंत

सच तो ये है .............

सच तो ये है कि हर कोई सच्चाई से डरता है
अंधेरी राहों पर आदमी परछाईं से डरता है

एक बेनाम से दुराहे पर खड़ा है हर कोई
एक तरफ मौत से डरता है, एक तरफ रुसवाई से डरता है

जो मुफलिस है ''अनंत'' और खुद्दार भी है
वो कुछ मांगन से पहले मनाही से डरता है

जवाब दे सकता है एक मजलूम भी सितमगर को
पर वो मजबूर अपने घर की तबाही से डरता है

खून बहता है जिसकी रगों मे, और जो जिंदा भी है
वो शेर की औलाद कब लड़ाई से डरता है

बेगुनाह और पाक -ओ- साफ है जो शक्स
रोज़-ए-हश्र पर वो कहाँ किसी की गवाही से डरता है

डरा सकता नहीं कोई सच्चों को दुनिया में
जो सच्चा इंसान है वो फकत खुदा की खुदाई से डरता है

तुम्हारा--अनंत 

उसका असर .....

उसका असर कुछ इस कदर हो गया है
कि असर का असर भी बेअसर हो गया है

इस लूटे हुए दिल को कोई दिल क्यों कहेगा
ये दिल तो एक उजड़ा शहर हो गया है

राहें और मंजिल जिसकी दोनों ही गुम हैं
वो मदमस्त राही बेफ़िकर हो गया है

जो समंदर की सोहबत में रह करके लौटा
वो थोड़ा सा साहिल, थोड़ा लहर हो गया है

ये बद्हवास ख्वाबों की दौड़ थमती नहीं क्यों
आज आदमी खुद एक सफ़र हो गया है

तुमने लालच से उसे ऐसा मैला किया है
कि जो पानी था अमृत, वो जहर हो गया है

 तुम्हारा--अनंत 

उसकी आँखों के मकतब मे.............

उसकी आँखों के मकतब मे  मोहब्बत पढ़ के आया हूँ
मैं कतरा हूँ दरिया का, सहरा से लड़ के आया हूँ

काटा था पर सैयाद ने कि उड़ न सकूँगा
जो उसने बुलया तो मैं उड़ के आया हूँ

एक डायरी मे रख कर, उसने मुझे गुलाब कर दिया
खोला जो किसी ने तो फूल से झड़ के आया हूँ

मैं एक सूखी  हुई पंखुरी हूँ, तो क्या हुआ, मुझे होंठों से लगा लो
कसम खुदा की मैं खुद को मोहब्बत से मढ़ के आया हूँ

एक हरा -भरा दरख्त था मैं किसी जमाने में
किसी ने मेरी छाँव यूं खींची कि  उखाड़ के आया हूँ

यूं तो कोई गरज न थी मुझे तुम्हारी महफिल मे आने की
पर क्या करू मैं तुम्हारी मोहब्बत मे पड़ के आया हूँ

तुमहरा--अनंत 

बुधवार, मई 02, 2012

कीमत..............

मेरे मकान पर पत्थर न मारो,
काँच की दीवार है, टूट जाएंगी,
कल छूटनी होगी जो गाड़ी साँसों की,
वो आज ही झटके से झूट जाएगी,
बड़ी तुनकमिजाज़ है शाम मेरी,
मत सताओ इसे ये रूठ जाएगी,
भरी है आँख की गगरी गम-ओ-अश्क से,
जरा आहिस्ते से छुओ इसे ये फूट  जाएगी,
मैं न रहूगा कल और न मेरी आवाज़ होगी
बस मेरी याद तेरे  दिल के कोने में सुगबुगायगी,
जताता हूँ मैं जो आज कीमत अपनी,
कल अपने आप तू खुद-ब-खुद समझ जाएगी,

तुमहरा --अनंत
  

मंगलवार, मई 01, 2012

हम शायरों की शायरी

नजाकत से पढ़ी जाए, नफासत से पढ़ी जाए
हम शायरों की शायरी,  शराफत से पढ़ी जाए

बगावत कर रही है मेरी नज़्म-ओ-गज़ल यारों
पसीने की ग़ज़ल को रुपयों में न तोला जाए

उनकी आँखों मे नमी है जिनके चूल्हे ठंडे हैं
चलो थोड़ी हमदर्दी की तपिश की जाए

चेहरों पर चस्पे हैं यहाँ कई-कई  चेहरे 
फरेबी चेहरों के असल चेहरे की नुमाईस की जाए

नेकी की राह पर बदी के खिलाफ
चलो साथ मिल कर लड़ाई की जाए

मौत पूछे जब किसे दूं पहले शहादत 
हर एक बन्दे की तरफ से पहल फरमाइश की जाए 

तुम्हारा --अनंत 

ग़ज़ल बन जाती है,

जब बैठता  कलम ले कर तेरी याद आती है,
मिलती है  कलम कागज़ से ग़ज़ल  बन  जाती है,
तेरी आँखों के सूरमे पर लिखता हूँ पहले,
फिर तेरी घटाओं जैसे बाल पर नज़र जाती है,
तेरे माथे का नूर पीता हूँ प्यासे की तरह,
फिर कलम रेंग कर  जिगर में उतर जाती है,
तेरे बदन पर फैली बर्फ की उजली चमक से,
 मेरी और कलम की आँख चौंधिया जाती है,
उतरता हूँ जब मैं तेरी नसों में अहिस्ते से,
एक कुआंरी अनछुई  लड़की की आवाज आती है,
बहता हूँ घडी दो घडी तेरे लहू  में घुल कर,
तेरे जिगर की धडकनों से मेरे दिल की फ़रियाद आती है,
बैठता हूँ कलम ले कर ग़ज़ल बन जाती है,
मिलती है कलम कागज़ से ग़ज़ल बन जाती है,

तुम्हारा--अनंत

रविवार, अप्रैल 29, 2012

आग की गली

आग की गली में बेफिक्र पागल
एक बूँद टहलती है फकीरों की तरह

जिसने महसूस की गरीबों की बिस्तर की चुभन
वो कहाँ  सो सका  है वजीरों की तरह

मोहब्बत हो गयी बगावत से, बागी हो गए थे जो
बाँधा था कफ़न सर पर सेहरों की तरह

जिन्हें पसंद है रेंग कर जीना जी रहे है वो
लड़े जो जुल्म से यारों मर गए शेरों की तरह

याद में उनकी जब कभी  चराग जलाता हूँ
सिर पर कोई हाँथ फेर देता है,  बुजुर्गों की तरह

महफूज हूँ मैं उनके सायों के तले
वो मुझे घेरे हुए हैं दीवारों की तरह

तुम्हारा-अनंत   
   
आग की गली में बेफिक्र पागल,
एक बूँद टहलती है फकीरों की तरह,
जिसने महसूस की गरीबों की बिस्तर की चुभन,
वो कहाँ  सो सका  है वजीरों की तरह,
मोहब्बत हो गयी बगावत से, बागी हो गए थे जो,
बाँधा था कफ़न सर पर सेहरों की तरह,
जिन्हें पसंद है रेंग कर जीना जी रहे है वो,
लड़े जो जुल्म से यारों मर गए शेरों की तरह,
याद में उनकी जब कभी  चराग जलाता हूँ,
सिर पर कोई हाँथ फेर देता है,  बुजुर्गों की तरह,
महफूज हूँ मैं उनके सायों के तले,
वो मुझे घेरे हुए हैं दीवारों की तरह,

तुम्हारा-अनंत   
   

तू मुझे नज़र आती है


aमेरे हर ख़्वाब में, तू मुझे नज़र आती है ,
एक पल हाँथ में होती है, दुसरे पर बिखर जाती है,
तड़पता हूँ मैं, रेगिस्तान में पड़ी मछली की तरह,
देखता हूँ तुझको तो तबियत संवर जाती है,
तेरा मुझको देखना भी हरारत भरी छुवन है,
तू देखती है जब नस-नस सिहर जाती है,
मैं चुरा लेता हूँ आँख, तुझे देख कर न जाने क्यों,
और तू भी मुझे देख कर यूँ ही गुज़र जाती है,
याद आती नहीं तुझको इस आवारा शायर की,
या फिर याद करती है और धीरे से बिसर जाती है,
तू साहिल है बेशक ठुकरा दे मुझे,मैं फिर आऊंगा,
लहर हूँ मैं, और लहर ही साहिल से करीब जाती है


तुम्हारा --अनंत   

गुरुवार, मार्च 29, 2012

कुछ अलग हो तो लगे, जिंदगी  जिन्दा है अभी,
कभी तो आए यहाँ, इतवार- सोमवार के बाद,
दम की दरकार है बहुत, बड़ा हौसला चाहिए,
कुछ नहीं बचता है दोस्त! बाज़ार के बाद,
उसकी लुटी अस्मत एक खबर ही तो है ,
कोई कुछ नहीं बोलेगा, अखबार के बाद ,
कोई कितना भी कायर हो वो लड़ जायेगा,
खून खौल उठता है, एक ललकार के बाद,
बड़ा नादाँ था मैं, जो न ये फ़लसफ़ा समझा,
फकत इंतज़ार ही मिलता है, इंतज़ार के बाद,
और भी जीत है  ''अनंत'' एक हार के बाद,
जिंदगी उठ खड़ी होती है हर वार के बाद,

तुम्हारा--अनंत

बुधवार, फ़रवरी 22, 2012

गला रुंधा हुआ हैं....

गला रुंधा हुआ हैं, आवाज़ दर्द में नहाई  हुई है,
मुझे बस इतना कहना है कि मेरे साथ बेवफाई हुई है,
आफसोस करूँ भी तो क्या करूँ, खाख-ए-दिल पर,
ये  आग-ए-मोहब्बत हमारी ही लगाईं हुई है,
उदास क्यों हूँ मैं, हर कोई मुझसे पूछता है,
इस उदासी के पीछे मैंने एक बात छिपाई हुई है,
बेफिकर हो जाए वो, जिसने मेरा दिल तोड़ा है,
मैंने उसका नाम न लेने की, कसम खाई हुई है,
जिस दिन  कहा उसने, हमें भूल जाओ ''अनंत''
बस उसी दिन से वो मेरे वास्ते पराई हुई है,
चलने दो मुझे वक़्त हो चला है, चलता हूँ मैं,
मुझे लेने को वो मुन्तजिर मौत आई हुई है ,

तुम्हारा-- अनंत

भूल गए.......

जिस्म मिला परिंदे का और हम उड़ना ही भूल गए,
जो करने आये थे यार यहाँ वो करना ही भूल गए,
सोचा था कह देंगे उसके मुंह पर, वो जुल्मी हैं,
पर देखा जब उसको तो कुछ कहना ही भूल गए,
पहले तो सह जाते थे, हम दर्द हिमालय के जितना,
पर अब कंकड़ जितना भी, हम गम सहना ही भूल गए,
हुआ करार था ये कि वो हमें छुएगा और हम ढह जायेंगे,
उसने छुआ सौ-सौ बार हमें, और हम ढहना ही भूल गए ,
सहरा पर खड़े मुन्तज़िर थे, और हम दरिया सा बहने वाले थे,
हम कुछ यूँ उलझे अपने में ही कि हम बहना ही भूल गए, 
नीड़ का तिनका-तिनका जोड़ा, और सारा जीवन बीत गया,
वक़्त जो आया रहने का, तो हम रहना ही भूल गए ,

तुम्हारा-- अनंत 


सोमवार, फ़रवरी 20, 2012

वो अरमान हैं मेरा ......

वो अरमान हैं मेरा जो मेरी आँखों में चमका,
ये अँधेरी राहों में कर देता है उजियारे,
खार चुभते हैं जब जब दर्द लिख देता हूँ,
लोग पढ़ते  हैं उसे समझते हैं गीत हमारे,
मायूसी में भी मायूस होने नहीं देता हौसला मेरा,
आँख बंद करता हूँ दिखा देता है मंजिल के नज़ारे,
लड़ाई जारी है बचपन से ही मेरी और परेशानियों की,
लड़े जिस्म-ओ-जाँ से दोनों, न वो हारी न हम हारे,
बस इतना कहते हैं की मंजिल तक पहुँच ही जाएँगे,
ठीक वैसे ही जैसे पहुँचती  हैं, लहर समंदर के किनारे,
गम-ओ-दर्द से लैस जिएँ तनहा, तो भी कोई गम नहीं,
चाह इतनी कि मरने के बाद भी न लोग हमकों बिसारे,

तुम्हारा--अनंत


चाहता हूँ दो घडी बैठूं सुकून से ......

चाहता हूँ मैं भी दो घडी बैठूं सुकून से,
पर क्या करूँ मोहलत नहीं मिलती जूनून से,
दौड़ता हूँ दिन-रात ख्व्बों के पीछे इस कदर,
कि पाँव मेरे सन गए हैं, मेरे खुद के खून से,
शहर की महफ़िलों में मुझे सिर्फ तन्हाई मिली,
कितना दूर चला आया हूँ, मैं अपने गाँव कि धूम से,
दूर से देखा था तो लगा, कि ये भीड़ काफी अच्छी है,
पर अब तंग आ चूका हूँ इस मशीनी हुजूम से,
लिए फिरते हैं दुनिया की  दौलत-ओ-शोहरत साथ अपने,
फिर भी लगते हैं ये लोग कितने महरूम से,
पढ़े लिखे इंसानों में एक मशीन पनप आई है,
एक मुद्दत से नहीं मिलें हैं,कहीं इंसान मासूम से,

तुम्हारा --अनंत





जब तुम याद आए....

छलकी बूँदें आँखों से, जब तुम याद आए,
आह!  भरी हमने, जब तुम याद आए,
महकीं यादों की गीली माटी रातों में,
बहकी हसरत मेरी,जब तुम याद आए,
बुलंद शोलों से झुलसे,चैन-ओ-सुकून के दरखत,
रात जग कर बिता दी हमने, जब तुम याद आए,
जा रहे थे दर-ए-खुदा,  इबादत के वास्ते,
कदम मुड़ गए मैखाने की ओर, जब तुम याद आए,
तेरे एहसास के दस्तक ने, हमें कुछ ऐसा बदला,
हम, हम न रहे यार, जब तुम याद आए,
दीवानों की तरह बेसबब गुजरे तेरी गली से,
दुनिया हँसी हम पर, जब तुम याद आए,


तुम्हारा--अनंत

बुधवार, फ़रवरी 15, 2012

ऐ जिन्दगी जरा अहिस्ते चल...

ऐ जिन्दगी जरा अहिस्ते चल,
कहीं दौड़ते-दौड़ते न दम निकल जाए,
सुकूँ  की तलाश चैन की चाहत में,
हम ये कहाँ बदहवासों के शहर चले आए,
सादगी खतरे में है हमारी,
डर है हमें कहीं हम भी न बदल जाएँ,
खतरनाक है सुबह यहाँ की शाम ज़ालिम है,
ये आदमखोर चौराहे,कहीं हमें भी न निगल जाएँ,
गर्मी तेज हैं यहाँ दौलत की, इंसान पिघलते हैं,
कहीं ऐसा न हो कि मेरे भीतर का भी आदमी पिघल जाए,
हर कोई डंक मरता है यहाँ सांप और बिछुओं की तरह,
बात करता नहीं कोई ऐसी कि दिल ये बहल जाए,
बड़ी ताजीब-ओ-सलीके से जीते है लोग यहाँ,
कभी उनका दिल नहीं करता कि बच्चों सा मचल जाएँ,
लौट आए हैं हम गाँव की झोपडी में ''अनंत'',
बड़ा मुश्किल है कि फिर लौट के शहर के महल जाएँ


तुम्हारा--अनंत 

शनिवार, नवंबर 12, 2011

तिरंगा लपेटा है ,

एक  इंसान साज़िस में मारा था.................................गाँव आया है ,

इस टूटी हुई चटाई पर कौन लेटा है ,
दर्द जिसका गहरा है ,घाव छोटा है ,
एक इंसान साज़िस में मारा था गाँव आया है ,
जिस्म पर जिसके कफ़न के जगह तिरंगा लपेटा है ,
आज कल एक अजब लड़ाई है मेरे वतन में  ,
एक ओर किसान बाप है ,एक ओर  जवान (सैनिक)बेटा है ,
क्यों हँसा रहे हो हमको हम रो पड़ेंगे ,
कैसे बताएं हमने इन आँखों में क्या-क्या समेटा है ,
एक हमारा पेट है जो भूख से ही भर जाता है ,
एक उनका पेट है जो सारा वतन खा कर भी भूखा है ,

तुम्हारा  -- अनंत

यकीन कैसे हो ,

हम जी रहे हैं इसका हमें यकीन कैसे हो ....................................
हम जी रहे हैं इसका हमें यकीन कैसे हो ,
आसमाँ ने आज तक पुछा नहीं ऐ जमीन कैसे हो ,
जिस इंसान ने खुद कभी गौरैया की पीरा झेली हो ,
वो इंसान फिर बाज सा कमीन कैसे हो ,
लग रहा है यार फिर चुनाव आया है , 
नेता जी पूछ रहे हैं रामदीन कैसे हो ,
जो लोग कम थे उन्हें कमतर बना करके ,
बेहतर लोग सोचते हैं बेहतरीन कैसे हों ,
ये शहर मशीनों का है जहाँ हम रहने आये हैं ,
अब तो रात दिन सोचते हैं कि मशीन कैसे हो ,
बना कर पुर्जा मेरे दिल को किसी मशीन में लगा दिया ,
अब हँसे कैसे ये लैब ये आँखें ग़मगीन  कैसे हो ,

तुम्हारा -- अनंत 

सोमवार, मई 16, 2011

सच्ची मोहब्बत

सच्ची मोहब्बत यूँ ही कहने-सुनने की चीज़ नहीं होती ,
ये वो चीज़ है ''अनंत ''जिसे दिल से समझना पड़ता है ,
गुमनामी है ,बदनामी है ,पागलपन और बदहवासी है ,
बस इन्ही  सब के साथ , दिन-रात रहना पड़ता है ,
एक बार मेरी ग़ज़ल को सीने से लगा कर तो देखो ,
तुम्हे एहसास होगा ,गम से ग़ज़ल गढ़ना पड़ता है ,
जब तुम समझती नहीं हो , मेरी आँखों की बात ,
मुझे मजबूरी में इन कागजों से कहना पड़ता है
 बरसात आती है जब  ,तूफ़ान साथ ले कर के ,
दरख्तों को गिरना पड़ता है ,घरों को ढहना पड़ता है ,
मोहब्बत एक ऐसा बेरहम मक़तल है ,जहाँ पर ,
जिसे जीने की चाहत में  ,हँस कर मरना पड़ता है ,
अरमानों के परिंदों का ,तुमने पर काट दिया  है ,
बेचारे परिंदों को ,बिना पर के  उड़ना पड़ता है ,
हाँ ये सच कहा तुमने की हम कोई शायर नहीं है ,
पर अश्कों को कहीं न कहीं तो  बहना पड़ता है ,

तुम्हारा --अनंत 

तुम्हारी और मेरी मुस्किल

तुम्हारी और मेरी मुस्किल, कोई नई नहीं है यार ,
अक्सर जिस्म जान को, समझ नहीं पाता ,
लाख उलझन को सुलझाने की कोशिश करो ,
जो दिल का उलझा है फिर, सुलझ नहीं पाता ,
यूँ ही खामोश नहीं हो जाता, मैं तेरे सामने , 
ढूंढता हूँ लब्ज़ पर लब्ज़ नहीं पाता ,
मेरे दीद के बादल तेरी याद में दिन रात बरसें  है ,
एक तेरी आँखों का सावन है, जो बरस नहीं पाता ,
हो वस्ल-ए-मौत तो ,खुदा से एक बात पूंछे हम ,
जिसे हम समझते हैं, वो क्यों हमे समझ नहीं पाता ,

तुम्हारा --अनंत  

रविवार, मई 15, 2011

पत्थर का शहर

चलो अँधेरा करो यारों कि अब उजालों से डर लगता है ,
कदम -दो - कदम चलना भी अब सफ़र लगता है ,
न करो रहमत , न हम पर रहम करो तुम ,
तुम्हारा रहम-ओ-करम ,अब हमें कहर लगता है ,
टुकड़े-टुकड़े में बँटी है ,जीते नहीं बनती ,
जिन्दगी का हर एक टुकड़ा कम्बख़त ज़हर लगता है ,
हम तो कांच के थे ,यहाँ आ कर फूट गए ,
ये तेरा शहर हमे ,पत्थर का शहर लगता है ,
जिसकी खबर में हम दुनियाँ कि खबर भूल गए ,
वो ख़बरदार मेरी खबर से बिलकुल बेख़बर लगता है ,
जो एक कदम भी न चला सफ़र में साथ ''अनंत ''
न जाने किसलिए  वो हमे  हमसफ़र लगता है , 

तुम्हारा -- अनंत 

मंगलवार, मई 10, 2011

जब से बिछड़े हैं हम उनसे ,

जब से बिछड़े हैं हम उनसे ,
हम कुछ खोए-खोए हैं ,
कोई अरमान-ए-दिल अब न  जगाए ,
वो बड़ी मुश्किल से सोए हैं ,
एक-एक शेर ज़ख्म है मेरे ,
ग़ज़ल के धागे में बड़ी आहिस्ते से पिरोए हैं ,
उनके हमारे इश्क की दास्ताँ है बस इतनी ,
वो हमारी मोहब्बत पर हँसे हैं  ,हम उनकी मोहब्बत पर रोए हैं ,
क्या कमाया अब तलक जिन्दगी में हमने ,
कुछ याद के मोती हैं जिसे दिल में सजोए हैं  ,
उनके प्यार ने हमको कुली बना दिया ''अनंत'' ,
उनकी यादों के सामान हमने दिन-रात ढोए हैं ,  
तुम्हारा --अनंत 

सोमवार, मई 02, 2011

हम क्यों कर हुए शायर ,

इश्क़ ने किस-किस को, क्या-क्या बना दिया ,
किसी को दरिया बना दिया ,किसी को सहरा बना दिया ,
जो लोग बढ़िया थे ,उनको  बद्त्तर बना दिया ,
जो लोग बद्त्तर थे ,उन्हें बढ़िया बना दिया ,
आँखें ले गया वो ,अपनी आंखों में फँसा कर , 
आँखें  होते हुए भी ,उसने हमे अंधा बना दिया , 
जलते हैं बेसबब ,बेदर्द वीराने में , तन्हाँ ही ,
उसकी आशिकी ने हमे ,बुझता दिया बना दिया ,
हम क्यों कर हुए शायर ,क्या हमसे  पूछते हो ,
बीमार -ए-इश्क़ थे बस  ,इसी बिमारी ने हमे शायर बना दिया ,
दास्ताँ क्या है हमारी '' अनंत '' बस इतना जान लो तुम ,
किसी को हमने मना किया ,किसी ने हमको मना किया ,
 तुम्हारा --अनंत  

मंगलवार, अप्रैल 19, 2011

मेरा कितना है ,तेरा कितना ,

इस सुबह में मेरे हिस्से का सवेरा कितना है ,
चराग बुझा कर देख लो, अँधेरा कितना है  ,
तेरे नाम पर तो दावे बहुत लोग करते हैं ,
दिल कहता है आजमा कर देख लूँ, तू  मेरा कितना है,
उस डेरे से उडा था ,इस डेरे पर है ,उस डेरे पर बैठेगा ,
खुदा जाने, इस परिंदे का ,डेरा कितना है ,
भागता हूँ रातो-दिन ,पर अब तक भाग नहीं पाया ,
कोई बतला दे उसकी यादों का ,ये  घेरा कितना है ,
गुनाह हुआ है मुहब्बत में ''अनंत ''तुझसे  भी ,मुझसे भी ,
न जाने इस गुनहा में कुसूर मेरा कितना है ,तेरा कितना ,
 ''तुम्हारा --अनंत '' 

रविवार, अप्रैल 17, 2011

मैं मान नही सकता

मनाना है मुझको तो मुहब्बत से मना लो तुम ,
दिखोगे आँख मुझको तो ,मैं मान नही सकता ,
तलवारें सर  काटती होंगी ,मैं मान सकता हूँ ,
तलवारें  इरादा -ओ -हौसला काटें  ,मैं मान नही सकता ,
दिल ने कह दिया तो कह दिया ,अब क्या कहना,क्या सुनना ,
दिल के अलवा किसी का कहा, मैं मान नही सकता ,
नासेह न जाने कितना कुछ समझाया था मुझको ,
पर मैने भी कह दिया, खुद को अजमाए बिना ,मैं मान नही सकता,
लागे हों लाख पहरे तो  लगे रहने दो अब  ''अनन्त'' 
उसके कूचे जाए बिना, मैं मान नहीं सकता ,
तुम्हारी आँखें हाँ कहती हैं,तुम्हारी जुबाँ न  कहती  हैं ,
सच्ची आँखों के आगे ,झूठी जुबाँ कि बात मैं,मान नही सकता,
तुम्हारा  --अनंत 

शुक्रवार, अप्रैल 15, 2011

वो शहर इलाहाबाद न होता !

मैं जीस्त के  सारे गम भूल जाता ,
गर वो मुझे अब तक याद  न होता ,
 मुस्कुरा ले  दिल ! ये कहता अपने दिल से मैं ,
गर दिल बेचारा ये, मेरा नाशाद न होता ,
ये दर्द की दौलत मुझे कैसी मिलती यार, 
गर मैं उसकी चाहत में, इस कदर बर्बाद न होता ,
बड़ा तल्ख़ था वो वक़्त, जिसने हमें शायर बनाया हैं, 
हम कायर हो गए होते, गर इरादा फौलाद न होता ,
बड़ी तरीके से मारा हैं, उसने हमें प्यार में अपने,
कौन मरता हंस करके ,गर वो यूँ हंसी जल्लाद न होता ,
कई भटके हुए आशिक बसे हैं,  इस अदब के जंगल में,
गर उन्हें मंजिल मिल गयी होती, ये जंगल आबाद न होता ,
एक शहर में दो संगम हो नहीं सकते ,
हमारा मिलन हो गया होता, गर वो शहर इलाहाबाद न होता ,
तुम्हारा --अनंत                                                         
                                                       

सोमवार, अप्रैल 11, 2011

हवाओं में बुत

मंजिलें एक हैं ,एक रास्ते  हैं ,
वो हमारे वास्ते हैं ,हम उनके वास्ते हैं ,
इन आँखों में फ़कत उनकी तश्वीर बसती है ,
हम हवाओं में भी  उनके  ही बुत तरासते हैं, 
वो खामोस हैं ,दुनिया को ये लग रहा है ,
दुनिया  को क्या पता ,वो हमे आँखों से पुकारते है ,
आँखों की चोरी तो इश्क में लाजमी  है ''अनंत ''
हम आँखें चुरा -चुरा ,कर एक दूजे को निहारते है ,
तुम्हारा -- अनंत


रविवार, मार्च 13, 2011

जिश्म पे घाव

तुम्हारा मुरझाया हुआ चेहरा ,तुम्हारी कहानी है ,
तुम्हारी आँखों में आँसूं नहीं, गंगा का पानी है ,
अपने जिश्म  पे घाव बड़े चाव से ढो रहे हो तुम ,
तुम कुछ कहते क्यों नहीं , मुझे बड़ी हैरानी है ,
गद्दार दरख्तों के साये में  बैठना गद्दारी है ,
बेमन हवाओं में सांस लेना ,बेमानी है ,
ये वक़्त नमाज़  का वक़्त है शायद ,
तभी तो सड़कें इतनी वीरानी है ,
जो बात अब तक अनकही थी अनसुनी थी ,
तुम सुनो न सुनों ,हमें तो सुनानी है ,
तुम्हारा --अनंत 

शनिवार, मार्च 12, 2011

सुलझा रहा हूँ

उसके उलझे बालों पर लिखी थी एक नज़्म ,
वो अब तक उलझी है ,सुलझा रहा हूँ ,
एक हवा सी आई ,याद जग गयी उसकी ,
मैं थपकियाँ दे -दे कर, उसे सुला रहा हूँ ,
कह गयी थी जाते वक़्त ,आवाज़ मत देना ,
वो चली गयी है ,और मैं उसे बुला रहा हूँ ,
एक उदास ग़ज़ल की आँखों में ,नमी के मिसरे ,
बिखरे हुए हैं ,और मैं उसे सजा रहा हूँ ,
जिस जगह बिछड़े थे हम ,ये उसी जगह पड़ा था ,
मैं टूटा हुआ दिल, झुनझुने सा बजा रहा हूँ ,
कुछ जलता हुआ सा है मेरे सीने में ,न जाने क्या है ?
मैं रो -रो कर , उसे अश्कों से बुझा रहा हूँ , 
जिंदगी आई ,ज़मीं पर बैठ गयी हंस कर ,
मैंने  कहा ,अरे रुको मैं अपनी जाँ बिछा रहा हूँ ,
बहुत खोल दिया मैंने खुद को ,तुम्हारे सामने ''अनंत''
न जाने तुम कौन हो मेरे ,जो मैं  राज -ए- दिल बता रहा हूँ ,
''तुम्हारा --अनंत '' 







कल रात से

एक धुवाँ सा बैठा हुआ है मेरे भीतर, कल रात से ,
उठने का मन ही नहीं करता, मैं सोया हुआ हूँ, कल रात से , 
वो मिल गया था ,कल शाम चौराहे  पर , कुछ इस तरह,
कि उससे मिल कर, मैं खोया हुआ हूँ, कल रात से ,
वो जो चराग है ,जल रहा है ,कुछ वक़्त में बुझ जायेगा ,
क्या करे बेचारा अकेले ही  लड़ रहा है ,कल रात से ,
वो शायद  मोम था जिसे मैंने  गरमजोशी से छू दिया ,
लगातार वो मोम का पुतला पिघल रहा है, कल रात से ,
चाँद आवारा हो गया है ,घर पर रुकता ही नहीं ,
बस यहाँ -वहाँ ,जहाँ -तहाँ ,टहल रहा है, कल रात से ,
बरदास्त होता नहीं लगता है जाँ निकल जाएगी ,
एक अदना सा दर्द था जो बढ़ रहा है, कल रात से ,
माँ ने पायल बेंच कर एक किताब मुझे दिलाई है ,
आँखों में आंसू लिए मैं उसे पढ़ रहा हूँ ,कल रात से ,
तुम्हारा --अनंत

















गुरुवार, मार्च 10, 2011

जिन्दगी घाँस नोचती है

 किसी टीले पर अकेले बैठ कर सोंचती  है ,
जिन्दगी जब मायूस होती है तो घाँस नोचती है ,
पड़ती है  जब डांट सास की ससुराल में ,
माँ को याद करके बेटियाँ आंसू पोछती है ,
अँधेरी रात जब अँधेरे से परेशान हो जाती है ,
खुद घर से निकल कर जुगनूवों की टोलियाँ खोजती है,
तितलियाँ नादान हैं  ,मासूम हैं , पछ्ताएँगी ,
ये जो फरेबी फूलों का फरेबी रस चूसती हैं ,
बच्चें चले गए हैं परदेश ,क्या करें, अकेलें हैं ,
दो बूढी आँखें हैं  घर पर ,जो एक दूजे को देखती है ,
''अनंत'' उन बुजुर्गों की आँखों से फिर आंसू नहीं बहते ,
जिनकी  बहती आँखों को नन्हीं हथेलियाँ पोंछती है,
 तुम्हारा- -अनंत   
  

बुधवार, मार्च 09, 2011

चुप रहना पड़ता है

चुप रहो यहाँ पर ,चुप ही  रहना पड़ता है ,
जो न कहना चाहो वो भी हंस -हंस  कहना  पड़ता है ,
मुर्दों के शहर  में सब मुर्दे जिन्दा बन कर रहते है ,
 मुर्दों के बिच में रहना है ,तो मुर्दा बन कर रहना पड़ता है ,
हम  तो एक परिंदा हैं, हवा के संग उड़ जायेंगें ,
जिसे  परिंदा बनाना है ,हम जैसा उड़ना पड़ता है ,
बात कहने को तो हर कोई अक्सर  ही कह देता है ,
पर बात को, बात की तरह कहने को, हिम्मत करना पड़ता है ,
कौन उन्हें समझाए, जो एक बार गिरे, और टूट गए ,
गर सिर ऊंचा कर के चलना है ,तो गिर -गिर कर उठाना पड़ता है ,
 तुम्हारा --अनंत  

मंगलवार, मार्च 08, 2011

आदमी


वो जो आदमी नहीं है ,आदमी बने फिरते है ,
ये जो आदमी हैं, इन्हें लगता ही नहीं ,ये आदमी हैं ,
आज आदमी,आदमी से मतलब रखता नहीं ,
इन  आदमी जैसों को कैसे कहें ,कि ये आदमी है ,
आज इस  कदर बोझ है आदमी के कन्धों पर ,
कि आदमी ,आदमी हो कर भी, लगता नहीं कि आदमी है ,
एक आदमी को कल देखा था नाली से चावल बिनते हुए ,
मेरे भीतर के आदमी ने मुझसे पुछा, कि क्या ये आदमी है ,
एक पागाल के जख्म को एक कुत्ते ने चाट-चाट  कर ठीक कर दिया,
लोगों ने कहा ,क्या कुत्ता है ,मैंने कहा, क्या आदमी है 
हर एक आदमी एक अजब गफलत में है आज  ,
वो आदमी नहीं है ,फिर भी उसे लगता है, कि वो आदमी है ,
आदमियों कि भीड़ में, आदमी खोजता हूँ मैं ,
ये आदमी मुझे देख कर कहते है ,क्या अजीब आदमी है ,
जब कभी देखता हूँ ,किसी आदमी को, तो देखता हूँ, 
इस आदमी के भीतर भी क्या कोई आदमी है ,
खुद के दर्द पर तो हर कोई रोता है ''अनंत'' ,
जो गैंरों के दर्द पर रो पड़े बस वही आदमी है ,
तुम्हारा --अनंत


समंदर का इन्तिजाम हो सकता है

करो हिम्मत तो हर काम आसान हो सकता है ,
इतिहास के पन्नों पर तुम्हारा भी नाम हो सकता है ,
आज जिस नाम पर इतना इतरा रहे हो तुम ,
कल  तुम्हारा वो नाम  भी गुमनाम हो सकता है,
शाम उसकी आँखें पढ़ी ,तो पता चला ,आँखें डाकिया होती है ,
 वरना क्या खबर थी ,आँखों में भी ,प्यार का पैगाम हो सकता है , 
हंसी  आये तो जंगलों की तरफ भाग जाया करो ,
यूं शहर में हंसोगे तो यहाँ रहना हराम हो सकता है ,
ये मंदिर -मश्जिद भी तो  किसी मैखाने से कम नहीं ,
यहाँ फिरकापरस्ती का जाम पी कर, दिमाग जाम हो सकता है,
एक पागल मिला था चौराहे पर पर रोता हुआ ,
बोला मेरा नाम रहीम हो सकता है ,या फिर राम हो सकता है ,
कुछ नामुमकिन नहीं है अनंत बस अरमानों में जोर हो ,
चाहत बलंद हो तो सहरा में समंदर का इन्तिजाम हो सकता है ,
तुम्हारा-- अनंत  

शुक्रवार, मार्च 04, 2011

माँ....

वो मुझे चूमती थी ,गले लगाती थी ,प्यार देती थी ,
जब मैं रोता था, थाली में चंदा उतार देती थी ,
उसके दामन के छोर पर  बंधी रहती थी एक गट्ठी ,
उस गट्ठी को खोल कर वो मुझे दुलार देती थी ,
कोई काम  नहीं बिगड़ता था मेरा यारों ,
जब मैं घर से निकलता था ,वो मुझे  निहार देती थी ,
उसने जब भी माँगा खुदा से मेरी जीत मांगी ,
वो अपनी दुवाओं में मुझे सारा  संसार देती थी ,
मेरी माँ ही छिप कर बैठी रहती थी मेरे भीतर ,
जो मुझे चोट लगने पर अपने नाम पुकार  देती थी ,
बस एक वो ही थी पूरे जहाँ में ''अनंत''
जो मेरे ग़मों के बदले में  ,मुझ पर अपनी खुशियाँ वार देती थी ,
तुम्हारा--अनंत   

मुट्ठी में झाग

एक प्यासा कुंआं है ,एक अँधा चराग ,
पानी को छूने से, लगती है आग 
हांथों में लेकर समंदर चला था ,
अब तो मुट्ठी में केवल बचा है झाग ,
छोड़ कर जंगलों को सब चलते बने ,
खादी पहन कर दिल्ली में फिरते हैं नाग ,
आग बस्ती में तेरी है लग गयी ,
बुझाना है बुझा ,भागना है भाग ,
तू  इन्सां है ,तो इन्सां बन कर जी ,
क्यों इंसानियत के दमन पर बनता है  दाग ,
एक बुड्ढा सा दर्द थक कर सोया हुआ है ,
जरा धीरे से बोलो ,वरना जायेगा जाग ,
जुगनूवों को जोड़ कर एक कर दिया ,
अँधेरे में मिल कर सब हो गए चराग ,
तुम्हारा --अनंत