सोमवार, अप्रैल 11, 2011

हवाओं में बुत

मंजिलें एक हैं ,एक रास्ते  हैं ,
वो हमारे वास्ते हैं ,हम उनके वास्ते हैं ,
इन आँखों में फ़कत उनकी तश्वीर बसती है ,
हम हवाओं में भी  उनके  ही बुत तरासते हैं, 
वो खामोस हैं ,दुनिया को ये लग रहा है ,
दुनिया  को क्या पता ,वो हमे आँखों से पुकारते है ,
आँखों की चोरी तो इश्क में लाजमी  है ''अनंत ''
हम आँखें चुरा -चुरा ,कर एक दूजे को निहारते है ,
तुम्हारा -- अनंत


रविवार, मार्च 13, 2011

जिश्म पे घाव

तुम्हारा मुरझाया हुआ चेहरा ,तुम्हारी कहानी है ,
तुम्हारी आँखों में आँसूं नहीं, गंगा का पानी है ,
अपने जिश्म  पे घाव बड़े चाव से ढो रहे हो तुम ,
तुम कुछ कहते क्यों नहीं , मुझे बड़ी हैरानी है ,
गद्दार दरख्तों के साये में  बैठना गद्दारी है ,
बेमन हवाओं में सांस लेना ,बेमानी है ,
ये वक़्त नमाज़  का वक़्त है शायद ,
तभी तो सड़कें इतनी वीरानी है ,
जो बात अब तक अनकही थी अनसुनी थी ,
तुम सुनो न सुनों ,हमें तो सुनानी है ,
तुम्हारा --अनंत 

शनिवार, मार्च 12, 2011

सुलझा रहा हूँ

उसके उलझे बालों पर लिखी थी एक नज़्म ,
वो अब तक उलझी है ,सुलझा रहा हूँ ,
एक हवा सी आई ,याद जग गयी उसकी ,
मैं थपकियाँ दे -दे कर, उसे सुला रहा हूँ ,
कह गयी थी जाते वक़्त ,आवाज़ मत देना ,
वो चली गयी है ,और मैं उसे बुला रहा हूँ ,
एक उदास ग़ज़ल की आँखों में ,नमी के मिसरे ,
बिखरे हुए हैं ,और मैं उसे सजा रहा हूँ ,
जिस जगह बिछड़े थे हम ,ये उसी जगह पड़ा था ,
मैं टूटा हुआ दिल, झुनझुने सा बजा रहा हूँ ,
कुछ जलता हुआ सा है मेरे सीने में ,न जाने क्या है ?
मैं रो -रो कर , उसे अश्कों से बुझा रहा हूँ , 
जिंदगी आई ,ज़मीं पर बैठ गयी हंस कर ,
मैंने  कहा ,अरे रुको मैं अपनी जाँ बिछा रहा हूँ ,
बहुत खोल दिया मैंने खुद को ,तुम्हारे सामने ''अनंत''
न जाने तुम कौन हो मेरे ,जो मैं  राज -ए- दिल बता रहा हूँ ,
''तुम्हारा --अनंत '' 







कल रात से

एक धुवाँ सा बैठा हुआ है मेरे भीतर, कल रात से ,
उठने का मन ही नहीं करता, मैं सोया हुआ हूँ, कल रात से , 
वो मिल गया था ,कल शाम चौराहे  पर , कुछ इस तरह,
कि उससे मिल कर, मैं खोया हुआ हूँ, कल रात से ,
वो जो चराग है ,जल रहा है ,कुछ वक़्त में बुझ जायेगा ,
क्या करे बेचारा अकेले ही  लड़ रहा है ,कल रात से ,
वो शायद  मोम था जिसे मैंने  गरमजोशी से छू दिया ,
लगातार वो मोम का पुतला पिघल रहा है, कल रात से ,
चाँद आवारा हो गया है ,घर पर रुकता ही नहीं ,
बस यहाँ -वहाँ ,जहाँ -तहाँ ,टहल रहा है, कल रात से ,
बरदास्त होता नहीं लगता है जाँ निकल जाएगी ,
एक अदना सा दर्द था जो बढ़ रहा है, कल रात से ,
माँ ने पायल बेंच कर एक किताब मुझे दिलाई है ,
आँखों में आंसू लिए मैं उसे पढ़ रहा हूँ ,कल रात से ,
तुम्हारा --अनंत

















गुरुवार, मार्च 10, 2011

जिन्दगी घाँस नोचती है

 किसी टीले पर अकेले बैठ कर सोंचती  है ,
जिन्दगी जब मायूस होती है तो घाँस नोचती है ,
पड़ती है  जब डांट सास की ससुराल में ,
माँ को याद करके बेटियाँ आंसू पोछती है ,
अँधेरी रात जब अँधेरे से परेशान हो जाती है ,
खुद घर से निकल कर जुगनूवों की टोलियाँ खोजती है,
तितलियाँ नादान हैं  ,मासूम हैं , पछ्ताएँगी ,
ये जो फरेबी फूलों का फरेबी रस चूसती हैं ,
बच्चें चले गए हैं परदेश ,क्या करें, अकेलें हैं ,
दो बूढी आँखें हैं  घर पर ,जो एक दूजे को देखती है ,
''अनंत'' उन बुजुर्गों की आँखों से फिर आंसू नहीं बहते ,
जिनकी  बहती आँखों को नन्हीं हथेलियाँ पोंछती है,
 तुम्हारा- -अनंत   
  

बुधवार, मार्च 09, 2011

चुप रहना पड़ता है

चुप रहो यहाँ पर ,चुप ही  रहना पड़ता है ,
जो न कहना चाहो वो भी हंस -हंस  कहना  पड़ता है ,
मुर्दों के शहर  में सब मुर्दे जिन्दा बन कर रहते है ,
 मुर्दों के बिच में रहना है ,तो मुर्दा बन कर रहना पड़ता है ,
हम  तो एक परिंदा हैं, हवा के संग उड़ जायेंगें ,
जिसे  परिंदा बनाना है ,हम जैसा उड़ना पड़ता है ,
बात कहने को तो हर कोई अक्सर  ही कह देता है ,
पर बात को, बात की तरह कहने को, हिम्मत करना पड़ता है ,
कौन उन्हें समझाए, जो एक बार गिरे, और टूट गए ,
गर सिर ऊंचा कर के चलना है ,तो गिर -गिर कर उठाना पड़ता है ,
 तुम्हारा --अनंत  

मंगलवार, मार्च 08, 2011

आदमी


वो जो आदमी नहीं है ,आदमी बने फिरते है ,
ये जो आदमी हैं, इन्हें लगता ही नहीं ,ये आदमी हैं ,
आज आदमी,आदमी से मतलब रखता नहीं ,
इन  आदमी जैसों को कैसे कहें ,कि ये आदमी है ,
आज इस  कदर बोझ है आदमी के कन्धों पर ,
कि आदमी ,आदमी हो कर भी, लगता नहीं कि आदमी है ,
एक आदमी को कल देखा था नाली से चावल बिनते हुए ,
मेरे भीतर के आदमी ने मुझसे पुछा, कि क्या ये आदमी है ,
एक पागाल के जख्म को एक कुत्ते ने चाट-चाट  कर ठीक कर दिया,
लोगों ने कहा ,क्या कुत्ता है ,मैंने कहा, क्या आदमी है 
हर एक आदमी एक अजब गफलत में है आज  ,
वो आदमी नहीं है ,फिर भी उसे लगता है, कि वो आदमी है ,
आदमियों कि भीड़ में, आदमी खोजता हूँ मैं ,
ये आदमी मुझे देख कर कहते है ,क्या अजीब आदमी है ,
जब कभी देखता हूँ ,किसी आदमी को, तो देखता हूँ, 
इस आदमी के भीतर भी क्या कोई आदमी है ,
खुद के दर्द पर तो हर कोई रोता है ''अनंत'' ,
जो गैंरों के दर्द पर रो पड़े बस वही आदमी है ,
तुम्हारा --अनंत


समंदर का इन्तिजाम हो सकता है

करो हिम्मत तो हर काम आसान हो सकता है ,
इतिहास के पन्नों पर तुम्हारा भी नाम हो सकता है ,
आज जिस नाम पर इतना इतरा रहे हो तुम ,
कल  तुम्हारा वो नाम  भी गुमनाम हो सकता है,
शाम उसकी आँखें पढ़ी ,तो पता चला ,आँखें डाकिया होती है ,
 वरना क्या खबर थी ,आँखों में भी ,प्यार का पैगाम हो सकता है , 
हंसी  आये तो जंगलों की तरफ भाग जाया करो ,
यूं शहर में हंसोगे तो यहाँ रहना हराम हो सकता है ,
ये मंदिर -मश्जिद भी तो  किसी मैखाने से कम नहीं ,
यहाँ फिरकापरस्ती का जाम पी कर, दिमाग जाम हो सकता है,
एक पागल मिला था चौराहे पर पर रोता हुआ ,
बोला मेरा नाम रहीम हो सकता है ,या फिर राम हो सकता है ,
कुछ नामुमकिन नहीं है अनंत बस अरमानों में जोर हो ,
चाहत बलंद हो तो सहरा में समंदर का इन्तिजाम हो सकता है ,
तुम्हारा-- अनंत  

शुक्रवार, मार्च 04, 2011

माँ....

वो मुझे चूमती थी ,गले लगाती थी ,प्यार देती थी ,
जब मैं रोता था, थाली में चंदा उतार देती थी ,
उसके दामन के छोर पर  बंधी रहती थी एक गट्ठी ,
उस गट्ठी को खोल कर वो मुझे दुलार देती थी ,
कोई काम  नहीं बिगड़ता था मेरा यारों ,
जब मैं घर से निकलता था ,वो मुझे  निहार देती थी ,
उसने जब भी माँगा खुदा से मेरी जीत मांगी ,
वो अपनी दुवाओं में मुझे सारा  संसार देती थी ,
मेरी माँ ही छिप कर बैठी रहती थी मेरे भीतर ,
जो मुझे चोट लगने पर अपने नाम पुकार  देती थी ,
बस एक वो ही थी पूरे जहाँ में ''अनंत''
जो मेरे ग़मों के बदले में  ,मुझ पर अपनी खुशियाँ वार देती थी ,
तुम्हारा--अनंत   

मुट्ठी में झाग

एक प्यासा कुंआं है ,एक अँधा चराग ,
पानी को छूने से, लगती है आग 
हांथों में लेकर समंदर चला था ,
अब तो मुट्ठी में केवल बचा है झाग ,
छोड़ कर जंगलों को सब चलते बने ,
खादी पहन कर दिल्ली में फिरते हैं नाग ,
आग बस्ती में तेरी है लग गयी ,
बुझाना है बुझा ,भागना है भाग ,
तू  इन्सां है ,तो इन्सां बन कर जी ,
क्यों इंसानियत के दमन पर बनता है  दाग ,
एक बुड्ढा सा दर्द थक कर सोया हुआ है ,
जरा धीरे से बोलो ,वरना जायेगा जाग ,
जुगनूवों को जोड़ कर एक कर दिया ,
अँधेरे में मिल कर सब हो गए चराग ,
तुम्हारा --अनंत  

शनिवार, फ़रवरी 26, 2011

बड़ा मुश्किल है...

जिस्म  जाँ से नाराज हो जाए ,बड़ा मुश्किल है , 
धड़कन कुछ कहे ,दिल सुन न पाए ,बड़ा मुश्किल है ,
सांस लिए बगैर जिया जा सकता, तो जी लेता ,
जीता भी रहे कोई ,और सांस न आए ,बड़ा मुश्किल है ,
बच्चे खिलौनों को फ़खत खिलौना नहीं समझते , 
कोई तोड़ दे उन्हें , वो आंसू न बहाएं ,बड़ा मुश्किल है ,
समझदार लोग जब नसमझी करें, तो हम क्या करें ,
समझदारों को भी समझाया जाए ,बड़ा मुश्किल है ,
वो भूल गए हमे,बड़े माहिर निकले , 
हम उन्हें भूल जाएं, बड़ा मुश्किल है ,
''तुम्हारा -- अनंत ''

शुक्रवार, फ़रवरी 25, 2011

सब दिखाई दे रहा है ,

कुछ बोलिए या  न बोलिए ,सब सुनाई दे रहा है ,
क्या छिपा रहें हैं  बेवजह ,सब दिखाई दे रहा है ,
आप खुद की अदालत में अब कैसे बच पाएंगे  ,
आपका दिल आपके खिलाफ गवाही दे रहा है ,
जिस उम्र में कोई टॉफी के लिए ज़िद्द करता है ,
उसी उम्र में कोई माँ -बाप को  कमाई दे रहा है ,
आज २६ जनवरी है ,चलो टी0 वी० खोलो ,
लाल किले की छत  पर चढ़ कर कोई सफाई दे रहा है ,
हमने जिसे वोट दे कर, अपनी किश्मत सौंपी  थी,
 वो हमे घोटाले ,भूंख ,तड़प,और महंगाई दे रहा है , 
तुम्हारा-- अनंत  

बुधवार, फ़रवरी 23, 2011

उलझा हुआ सा है कुछ ...

उलझा हुआ सा है कुछ ,शायद ये मेरा दिल है ,
फोड़ दे जो सिर लहेरों का, बस वही शाहिल है ,
चाँद के रुखसार पर दाग है ,लोग कहते  है ,
हमे तो लगता है ,वो कोई प्यारा सा तिल है ,
 हम उनकी आँखों में,  डुबकी लगाये बैठे है ,
बेहतरीन है ये जगह ,ताउम्र रहने  के काबिल है,
इस महफ़िल में सब हलके- फुल्के नज़र आते हैं .
एक हम ही शायद जो इस कदर  बोझिल  हैं ,
हमे फिर से क़त्ल होने की हसरत है अनंत ,
क्या करें कम्बख़त बड़ा खुबसूरत कातिल है ,
"तुम्हारा --अनंत ''


 


रविवार, फ़रवरी 20, 2011

ये अजीब कैदखाना है....



ये अज़ब अफरातफरी ,रस्साकसी का माहौल है,
कल तक जहाँ पर दुकानें थीं ,आज वहाँ पर मॉल है ,
पसीना छूटता है ,जब टूटता है, कोई सपना ,
ये आँसू थमते ही नहीं ,आँखों में अज़ब  ढाल है ,
मेरे नंगे तन पर, जब उसने रेशमी टुकड़ा डाला ,
 मुहं से यूँ ही निकला ,ये मेरी ग़ुरबत का माखौल है ,
बैठ कर तन्हाई में ,तन्हाई ,तन्हा ही रो लेती है ,
दिल के दर्द पर ,ये आवाज़ की जली हुई ख़ाल है ,
इस आश्मां में करफू लगा है ,क्या करें ,
छिन गयी है उड़ान ,परिंदे सभी बेहाल हैं ,
हैं फसे जिसमे सभी, सब कैद है,
उस अज़ब कैदखाने का नाम रोटी दाल है,
तुम्हारा --अनंत





शुक्रवार, फ़रवरी 18, 2011

मिली आँख जो उससे......

मिली आँख जो उससे ,वो पसीना -पसीना हो गयी ,
दबे पाँव ज़ीने  से उतरी, और उतर कर खो गयी ,
कल मैंने रात को रात भर जगाए रखा था ,
हुई सुबह तो दिन का दामन बिछा कर सो गयी ,
यूं तो पड़ा था मैं किसी नदि में सूखा -सूखा ,
तेरी याद की बारिश हुई और मुझे भिगो गयी ,
उस खंडहर के पीछे मैं अब कभी नहीं जाता ,
जहाँ तुम तन्हाई की सब्ज़ फसल बो गयी ,
अनंत मैं तो रुक गया होता ,थक कर बुझ गया होता ,
एक उसके आने की उम्मीद में जिंदगी चराग़ हो गयी ,
तुम्हारा --अनंत 


अनंत क्या कहें तुमसे...

अनंत क्या कहें तुमसे,बस दर्द कहता है,
ये खता तुम्हारी है, जो तुम उसे ग़ज़ल कहते  हो,
 तुम  दूर हो हमसे ,ये तुम्हारा कहना  है ,
हम तो  ये कहते  हैं , तुम हमारे दिल में रहते हो, 
पत्थर की तरह हम पड़े हैं ,न जाने कब से ,
ये तो तुम ही हो, जो हर वक़्त दरिया सा बहते हो,
हमारी हँसी को देख कर, दुनिया ग़फलत में है ,
लोग हमसे कहते  हैं ,तुम तो रोते वक़्त भी हँसते हो  ,
उस दिन वो कुछ नहीं बोला , जब हमने उससे  पूछा था ,
ए  ढलते हुए सूरज, तुम कैसे ढलते  हो,
जब दर्द होता है ,तब आंसू निकलता  है ,
तुम बेदर्द हो ,बेवजह  क्यों आँखे मलते हो  
तुम्हारा --अनंत  
   

गुरुवार, नवंबर 11, 2010

न हुआ मेरा कोई कोई....

न हुआ मेरा कोई कोई ,न मुझे किसी और का होना आया ,
मेरे आने पर न हंसा कोई ,न मेरे जाने पर किसी को रोना आया ,
मैं बादल था अश्कों का, बरसता तो भीगा भी सकता था,
पर अफसोस न मुझे बरसना आया ,न भिगोना आया ,

मैं जुता खेत सा पड़ा था उसके सामने ,वो मेरे सामने खड़ा था,
बड़ा नादाँ निकला वो कि जिसे मुहब्बत का बीज न बोना आया ,
टूट कर बिखरा था मैं जिसके भरोसे ,माला की तरह ,
उस बेरहम माली को, माला न पिरोना आया,
जी सकता है बस वही ,बेवफाई झेल कर अनंत ,
जिसे जिन्दगी के नाम पर मोत को ढोना आया ,
'' तुम्हारा --अनंत ''

बुधवार, नवंबर 10, 2010

जब दिल दुखता है हंस देते है....

हँसी अक्सर खुशी  ही नहीं दिखाती, कभी- कभी गम भी हँसी में लिपटा हुआ  दिखता है ,बल्कि मैं तो कहता हूँ जो ज्यादा हँसता है उसके दिल में ज्यादा गम होता है,और ऐसे हंसमुख लोगों का जब दिल दुखता है तो  वो रोते नहीं हँस  देते है,
तो आईये में आपको एक ऐसी ही कविता से रूबरू  कराता  हूँ, जहां दिल दुखने पर हंसी आती है रोना नहीं,



जब दिल दुखता है हंस देते है,
गुमसुम सी है कथा हमारी,
न पूछे कोई व्यथा हमारी,
हम नीरस पलों में जीते है,पर जग को कविता का रस देते है,
जब दिल दुखता है हंस देते है,
हम छाया से भी जल जाते है,
बर्फ के टुकड़ों सा गल जाते है,
जब उड़ते है अरमान हमारे,हम खुद उनको कस देते है,
जब दिल दुखता है हंस देते है,
सब कुछ गीला-गीला हो है,
कोई बीज याद के बो जाता है,
कितना भी रोकें हम पर,आखों के बादल अश्रु बरस देते है,
जब दिल दुखता है हंस देते है,


:::::तुम्हारा::::अनंत::::

सोमवार, नवंबर 08, 2010

मैं मर गया हूँ बहुत पहेले....


मैं मर गया हूँ बहुत पहेले,अब तो जिन्दा लाश बाकी है,
वो हो गयी है परायी फिर भी उसे पाने की आस बाकी है।
मैं अश्कों का समंदर पी कर भी प्यासा हूँ,
न जाने कैसी कम्बख्क्त है जो ये प्यास बाकी है
क्यों टूटती नहीं नब्ज, क्यों धड़कन बंद नहीं होती,
न जाने इस जिस्म में कितनी सांस बाकी है
तुझे मैंने पाया था कुछ इस कदर, 
तू जितनी खुद के पास नहीं ,उससे ज्यादा मेरे पास बाकी है
मिल गया मेरा पुर्जा -पुर्जा ,पर मेरा दिल खो गया है,
बस उसी खोये हुये दिल की तलाश बाकी है
जिस जगह जला इश्क का दरिया ,मुहब्बत का समंदर झुलसा था 
उसी जगह पड़ी हुई तेरी यादों की कपास बाकी है
मेरी लाश को दफनाते वक़्त जब जमीन ने मना किया 
हाँथ फ़ैल कर आकाश ने कहा ,अभी तो सारा आकाश बाकी है
""तुम्हारा --अनंत''



बहुत दिन बाद....

बहुत दिन बाद वो मुझसे हंस कर बोली थी
जो मैंने यूं ही पुरानी डायरी खोली थी,
हर शफे पर उसका चेहरा उभर आया था
हर एक हर्फ़ पर उसकी हंसी ठिठोली थी,
डायरी के आखरी पन्ने पर कुछ मैंने गढ़ा था
गौर से देखा तो पाया दो कंगन ,एक घगरा ,एक चोली थी,
मुझे याद आया यो पुराना शहर वो पुरानी गली
जिसमे मैं नुक्कड़ वाला था,और वो किनारे वाली थी,
दो नन्हे हाँथ बने थे किसी बीच के पन्ने पर 
एक हाँथ में कपडे की गुडिया थी ,एक हाँथ में कांच की गोली थी,
पढ़ी हरकत जो आपनी कहा मैंने हंस कर के
मैं भी ब़डा भोला था वो भी ब़डी भोली थी,
''तुम्हारा --अनंत ''