बुधवार, मई 17, 2017

मैंने सहरा का दिल टटोल कर देखा है...!!

मैं  जिसके इश्क़ में मोमिन हुआ था
वो यार मेरा, एक काफ़िर सनम था

मैंने सहरा का दिल टटोल कर देखा है
वहाँ एक हिस्सा आंसुओं से नम था

मैं आज जो ये शायर सा हो गया हूँ
ये कल मुझपे उसका किया करम था

उसने मेरा नाम लेकर आहें भरीं थीं
क्या ये होना मेरे वास्ते कम था

मैं उसके बिना भी ज़िन्दगी गुज़ार सकता हूँ
ये मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा भरम था

वो ख्वाब नहीं था जो अभी अभी टूटा है
वो आँखों पे सजा सबसे खूबसूरत वहम था

तुम जिसे हादसा कह रहे हो "अनंत"
वो मुझपे किया ख़ुदा का एक रहम था

तुम्हारा-अनंत

मंगलवार, मई 16, 2017

मैं तेरी याद में टूट कर बिखरना चाहता था...!!

तू मेरी ग़ज़ल थी मैं तुझे लिखना चाहता था
मैं हूबहू तुझ जैसा दिखना  चाहता था

वक़्त ने मुझको पत्थर बना दिया वार्ना
मैं अक्सर से झरनों सा बहना चाहता था

एक  बात है जो मैं अब किसी से कह ना सकूंगा
वो बात मैं तुझसे, बस तुझसे कहना चाहता था

कुछ मजबूरियाँ थीं, जो मैं ढह ना सका अबतक
वार्ना मैं एक कच्चे मकान सा ढहना चाहता था

मैं  तेरे इश्क़ में बंजारे का बंजारा ही रह गया
मैं तेरे दिल के किसी कोने में बसना चाहता था

मैं नहीं ठहरा, ठहरता तो मर गया होता
पर मैं दो घड़ी ठहर कर मरना चाहता था

मेरी कहानी हदों के मारे आदमी की कहानी है
मैं आदमी होने की सारी हदों से गुजरना चाहता था

तुमसे किए वादे मेरी बेकरारी का बाईस हैं
मैं तुझ जैसा वादों से मुकरना चाहता था

ना जाने क्या वजह है "अनंत" साबूत बचा हूँ मैं
मैं तेरी याद में टूट कर बिखरना चाहता था

तुम्हारा-अनंत

शुक्रवार, मई 12, 2017

ये सारे के सारे ग़म गुम हो गए होते...!!

जो कभी तुम मैं और मैं तुम हो गए होते
ये सारे के सारे ग़म गुम  हो गए होते

ज़िन्दगी एक हादसा थी पर हमने माना ही नहीं
जो मान लिया होता तो गुमसुम हो गए होते

हम चलते रहे हैं, जेठ की दुपहरी की तरह
जो ठहरे होते तो फागुन हो गए होते

तेरी मोहब्बत में हम दाग-दाग ही रहे
जो तुझसे नफरत होती तो साबुन हो गए होते

नहीं टूटे सो ज़िन्दगी के लुहार की ठनक हैं
बिखर कर मौत के पायल की झुनझुन हो गए होते

तुम्हारा अनंत  

सोमवार, मई 01, 2017

तुम मेरे दिलो-जॉ से उतर क्यों नहीं जाते

तुम मेरे दिलो-जॉ से उतर क्यों नहीं जाते
किसी ख्वाब की तरह टूट कर बिखर क्यों नहीं जाते

क्या बताऊँ अक्सर क्यों चले जाते हैं परिंदे
खड़े रहते हैं वहीँ, और कहीं शज़र नहीं जाते

तुम्हारी याद के मारे कई अजनबी मेरे भीतर  रहते है
मर मर कर जीते हैं  कमब्खत मर नहीं जाते

कुछ मुसाफिर हैं जो मुसलसल सफर में ही हैं
वो हर जगह जाते हैं मगर घर नहीं जाते

मैं तबतक शायर हूँ, जबतक जिन्दा हूँ
मैं तबतक जिन्दा हूँ,  जबतक ज़ख्म ये भर नहीं जाते

अनुराग अनंत



बुधवार, अप्रैल 26, 2017

जरुरी तो नहीं....!!

जो चाहो तुम्हे मिल जाए जरुरी तो नहीं
हर बार कोई तुम्हे बचाये जरुरी तो नहीं

अपने हिस्से का खुद ही रो लो तो बेहतर है
कोई तुम पे  भी अश्क़ बहाए जरूरी तो नहीं

कुछ ज़ख्म बहुत जरुरी है जिगर पर रहना
कमब्खत हर ज़ख्म भर जाए जरुरी तो नहीं

मैं ग़मज़दा हूँ तो मुझे ग़मज़दा ही रहने दो
कोई रोते हुए भी मुस्कुराए जरुरी तो नहीं

 कुछ बात है जो छिपाने को जी चाहता है
हर बात बता ही दी जाए जरुरी तो नहीं

मौत का लुत्फ़ उठा कर भी देखिये अनंत
जिंदगी ही हर मजा दे जाए जरुरी तो नहीं

अनुराग अनंत 

मुझे मौत की सख्त जरूरत है..!!

ये नींद अब मुझे सुला ना पाएगी
मुझे मौत की सख्त जरूरत है

जिंदगी हसीन है ये किसने कहा
मुझे इस जिंदगी से नफरत है

जो मेरी जान की जानी दुश्मन है
कम्बख़त उस शै का नाम उल्फत है

जितना जिया हूँ सब गुस्ताखी है
जितना जी रहा हूँ मेरी जुर्रत है

ये सांस क्योंकर बंद नहीं होती
ये मेरी जान पर अजीब आफत है

दो घडी रुको मैं रोना चाहता हूँ
क्या मुझे मैं होने की मोहलत है

अनुराग अनंत

मैं अपने ज़ख्मो पर ज़ख्म लगाता हूँ

ये शायरी मेरी जान की दुश्मन है
मैं जिसे मर मर कर गले लगाता हूँ

तुम जख्मो पर मरहम लगाते होगे
मैं अपने ज़ख्मो पर ज़ख्म लगाता  हूँ

तुम अपने होने पर कितना इतराते हो
मैं अपने होने से कितना घबराता हूँ

तुम जब मुझे जीने की दुआएं देते हो
मैं कुछ हल्का-हल्का सा मर जाता हूँ

एक नींद भीतर बहुत दिनों से जगती है
मैं उसको बाहर से रोज़ सुलाता हूँ

मैं रोज़ एक क़त्ल का आदी हूँ
मैं रोज़ खुद का गला दबाता हूँ

तुम्हारा - अनंत

शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2017

दर्द का ये पापी पर्वत जो गल जाता तो बेहतर था..!!

सपनों जैसा कोई अपना मिल जाता तो बेहतर था
सर मंडराता ये खतरा जो टल जाता तो बेहतर था

एक हिमालय भारी भारी छाती पे लिए घूम रहा हूँ
दर्द का ये पापी पर्वत जो गल जाता तो बेहतर था

इस सूरज की तेज तपिश में सब कुछ पिघल रहा है
नफरत वाला ये सूरज जो ढल जाता तो बेहतर था

इक रावण है, जो तेरे भीतर, मेरे भीतर हँसता है
किसी दशहरे ये रावण भी जल जाता तो बेहतर था

इश्क़ की छलिया गली में हम ये ख्याल लिए टहलते हैं
कोई मासूम सा छलिया हमको भी छल जाता तो बेहतर था

वो जो मुझको उसका रातों-दिन लाशों पे हँसना खलता है
तुमको भी कभी किसी का मरना खल जाता तो बेहतर था

अनुरग अनंत

बुधवार, दिसंबर 28, 2016

ये जो आदमी आज तलवार सा हो गया है

कुछ तो है जो मुल्क में जो बदल रहा है
कोई सूरज है जो आहिस्ते से ढल रहा है

नफ़रतों  की तपिश बहुत बढ़ने लगी है
मुहब्बतों का हिमालय पिघल रहा है

इस झूठी हंसी से दम घुटने लगा है
खुल के रोने को ये दिल मचल रह है

ये बात उनको बहुत नागवार गुजरी
ये मजलूम कैसे सर उठा कर चल रहा है

मेरे रोने पे उसने भी मेरा साथ छोड़ दिया
जो बरसों मेरी आँखों का काजल रहा है

ये जो आदमी आज तलवार सा हो गया है
ये आदमी भी किसी के पाँव का पायल रहा है

जो मुंह में आया साफ़-साफ़ कह दिया हमने
जमाना बस इसी बात का कायल राह है  

अनुराग अनंत

बुधवार, अक्टूबर 19, 2016

ये सवाल मेरी जान भी ले सकता है...!!

ये सवाल मेरी जान भी ले सकता है
ये सवाल फकत कोई सवाल थोड़ी है

ये दिल की गिरह है, इश्क की जकड़न है
कच्चे धागों से बना कोई जाल थोड़ी है

याद उसकी बेसब्री का सबब है लेकिन
आशिक परेशान है बेहाल थोड़ी है

होता है इश्क में  अक्सर हो गया फिर से
मेरी आशिक़ी तेरे हुस्न का कमाल थोड़ी है

आजिज़ आ गया हूँ अपने दिल से "अनंत"
पर दिल, दिल ही तो है, कोई बवाल थोड़ी है

तुम्हारा-अनंत

रविवार, मई 08, 2016

एक नज़र से उसने हमारी जिंदगी तबाह की...!!

एक नज़र से उसने हमारी जिंदगी तबाह की
हमें नाज़ ये कि न हमने उफ़ की, न आह की

वो हमें लूटते रहे और हम मुसलसल लुटते रहे
न हमने खुद को बचाया, न खुद की परवाह की

क्या अज़ब बेरुखी थी क्या गज़ब जुल्म था
उसने न हमसे बातें की, न हमपे निगाह की

हम जिनके इश्क़ में ताउम्र शायरी करते रहे
उसने न हमें कभी दाद दी, न कभी वाह की

इश्क में उसको माना हमने अल-खुदा की तरह
पर न उससे कभी फ़रियाद की, न कभी चाह की

अनुराग अनंत

जो चला गया है जिस्त से बहुत पहले...!!

जो चला गया है जिस्त से बहुत पहले
मैं उसे न जाने कब से बुला रहा हूँ

ये तन्हाइयों की क्या अज़ब तीरगी है
कि जिसमे दिल अपना जला रहा हूँ

मेरे सब ख्वाब अब बच्चों से हो गए हैं
मैं उन्हें थपकियाँ दे दे कर सुला रहा हूँ

ये गज़ब प्यास है जो बुझती ही नहीं है
मैं रह रह कर उसकों आंसू पिला रहा हूँ

याद उसकी मेरा दिल लहू कर रही है
मैं जिगर चाक करके उसे भुला रहा हूँ

अनुराग अनंत

सच बोलने का जज्बा हम अपने अन्दर ले कर चलते हैं...!!

सच बोलने का जज्बा हम अपने अन्दर ले कर चलते हैं
हम वो पागल कतरे हैं जो दिल में समंदर ले कर चलते हैं

उनसे कह दो कि यहाँ हैं सर भी बहुत और बाजू भी बहुत
जो लाठी, झंडा, तलवार, खुखरी और खंजर ले कर चलते हैं

वो आंधी, तूफानों और काले कानूनों से हमें डरता फिरता है
उसे नहीं मालूम हम अपने संग में बवंडर ले कर चलते हैं

हम उन किसानों के बच्चे हैं जो फांसी के फंदों की भेट चढ़े
हम अपनी आँखों में अश्क नहीं, मौत के मंजर ले कर चलते हैं

वो ऐयारों के सरदार 56 इंच की छाती पर फूले नहीं समाते हैं
और हम हैं जो अपनी छाती पर सारा अम्बर ले कर चलते हैं

हम खून-पसीने, जीने-मरने वाले कब हद-ए-जिस्म में कैद रहे
हम अब तो दर-ए-मकतल को जिस्म ये जर्जर लेकर चलते हैं

अनुराग अनंत

शनिवार, अप्रैल 30, 2016

ये जुमलों की महारत है, कुछ और नहीं...!!

ऐ मेरे दिल-ए-नादां, तू यूं खुश न हो
ये जुमलों की महारत है, कुछ और नहीं

ये जो उनकी चटक सुनहली तकरीरें हैं
ये ख्वाबों की तिजारत है, कुछ और नहीं

वो हमें बस एकलव्य, सम्भूक समझते हैं
ये रामायण, महाभारत है, कुछ और नहीं

ये जो काले दस्तूर, ये जेलें, ये जिन्दानें हैं
ये हमसे उनकी हिकारत है, कुछ और नहीं

वो जो चाहें कहें इसे, उनकी अपनी मर्ज़ी है
ये तेरा-मेरा, हमारा भारत है, कुछ और नहीं

अनुराग अनंत

अपने एहसासों को रिश्तों का इल्जाम न दे....!!

अपने एहसासों को रिश्तों का इल्जाम न दे
उल्फत को यार अब और कोई नाम न दे

एक और प्याला मौत का सबब बन सकता है
साकी प्यासा ही रहने दे, हमें कोई जाम न दे

जिंदगी तूने हमें फकत धूप ही धूप बक्शी है
दोपहर ही रहने दे, मेरे हिस्से में शाम न दे

मैं जनता हूँ, कोई खबर अच्छी हो नहीं सकती
उससे कह दो वो हमें अब कोई पैगाम न दे

उनके इल्मी उजाले में क्या जला, क्या कहें
वो हमें अब गाफिल ही रहने दे, इल्हाम न दे

ये जिंदगी उसे याद करने में बीती है “अनंत”
या खुदा किसी और को अब ऐसा काम न दे

अनुराग अनंत

इस दर्द को बर्बाद कौन करे..!!

नाशाद ही रहने दो दिल को
इस दिल अब शाद कौन करे

ये दर्द मुझे उसका तोफा है
इस दर्द को बर्बाद कौन करे

मैं यादों का वाहिद कैदी हूँ
इन यादों से आजाद कौन करे

कातिल और मुंसिफ वो ही है
अब उससे फ़रियाद कौन करे

वो चाहे मैं खुद को क़त्ल करूँ
पर मुझको जल्लाद कौन करे

यहाँ साये दरख्त निगलते हैं
इस शहर को आबाद कौन करे

हरसू धूप ही धूप का कब्ज़ा है
इस धूप को शमशाद कौन करे

अनुराग अनंत

बुधवार, अप्रैल 06, 2016

हमने खुद को खूब बर्बाद किया

कुछ मेरी राहें भी दुश्वार रहीं
कुछ हमराही ने भी न साथ दिया

बस कुछ ऐसा सफ़र कटा मेरा
जैसे किसी ने नसों को काट लिया

वो जिससे मैंने कभी न जीतना चाहा
बस उसी ने अक्सार मुझको मात दिया

ये जिंदगी जैसे-तैसे बसर हुई मेरी
रात को दिन, दिन को रात किया

वो संगदिल, पत्थर का बना हुआ
उससे रोया, उससे फ़रियाद किया

संग उसके हम जो न आबाद हुए
हमने खुद को खूब बर्बाद किया

कोई पूछे जिंदगी में क्या हुआ अनंत
वो हमको भूले, हमने उनको याद किया

--अनुराग अनंत

सोमवार, अप्रैल 04, 2016

खाख आबाद रहूँ जब दिल आबाद ही नहीं रहा


एक उसकी याद है जो दर छोडती ही नहीं है
एक वो है जिसे हमारा दर याद ही नहीं रहा

न दिल जलेगा अब, न जिगर ही सुलगेगा 
अच्छा हुआ उल्फत का फसाद ही नहीं रहा

हसरत तो है फिर से हमें कोई कतल तो करे
पर यहाँ उस जैसा कोई जल्लाद ही नहीं रहा

क्या गाफिल बने ये दिल, क्या दिल की करे
तुझे मिलके ये दिल अब आज़ाद ही नहीं रहा

क्या शादगी, क्या नाशादगी सब एक सा लगे 
हद-ए-हासिल था जो वो शमशाद ही नहीं रहा

मुझमे क्या बचा है अब "अनंत" सब वीरान है
खाख आबाद रहूँ जब दिल आबाद ही नहीं रहा

अनुराग अनंत

रविवार, दिसंबर 06, 2015

मैं कुछ इस कदर बंजर हुआ कि बरसता रहा हूँ...!!

मंजिलों को रहगुजर मैं कहता रहा हूँ
दर्द थमता नहीं सो मैं चलता रहा हूँ

वो कोई और है जो उफ़क पर उगा है
मैं तो न जाने कब से ढलता रहा हूँ

ये दरिया मेरे आंसूओं से बना है
मैं रिसता रहा हूँ, पिघलता रहा हूँ

न सूरज, न चंदा, न तारा ही था मैं
महज एक चराग सा जलता रहा हूँ

वो न हसीं, न आंसू, न ख़ामोशी समझे
वो कभी मुझको समझें तरसता रहा हूँ

वो इतने सुलझे थे कि अब क्या कहूँ मैं
उनकी सुलझन में अक्सर उलझता रहा हूँ

वो जो जाते हुए मेरा सावन अपने संग ले गए हैं
मैं कुछ इस कदर बंजर हुआ कि बरसता रहा हूँ

तुम्हारा-अनंत 

तुम ही कहो इससे बड़ा इंकलाब क्या होगा...!!

अपने कातिल को ही सरदार कहना पड़ता है
हमें इससे बढ़कर और अज़ाब क्या होगा

हमने अपनी हथेलियों पे जान रक्खी है
तुम ही कहो इससे बड़ा इंकलाब क्या होगा

हमारे यहाँ तो चरागों ने ही रोशनी कर दी
तुम रखो अब तुम्हारा आफताब क्या होगा

सारी रात अँधेरे में बसर कर दी हमने
सुब्ह को लाए जो ये महताब क्या होगा

हमने तुम्हारी असली सूरत पहचान ली है
हटा दो चेहरे पर से अब ये नक़ाब क्या होगा

वो मंजर देखा है हमने कि अब सो न पाएंगे
जो नींद ही नहीं आनी तो फिर ख्वाब क्या होगा

उनकी बातें ही चमन के चेहरे बिगाड़ देतीं है
वो जो बोल पाएं तो फिर तेज़ाब क्या होगा

इन अदालतों से आस नहीं कि उसका इन्साफ करे
अब देखना ये है, या खुदा तेरा हिसाब क्या होगा

वो डराते हैं हमें कि कुछ ख़राब हो जायेगा "अनंत"
जो होना था हो गया ख़राब अब इससे ख़राब क्या होगा

तुम्हारा-अनंत