बुधवार, फ़रवरी 22, 2012

भूल गए.......

जिस्म मिला परिंदे का और हम उड़ना ही भूल गए,
जो करने आये थे यार यहाँ वो करना ही भूल गए,
सोचा था कह देंगे उसके मुंह पर, वो जुल्मी हैं,
पर देखा जब उसको तो कुछ कहना ही भूल गए,
पहले तो सह जाते थे, हम दर्द हिमालय के जितना,
पर अब कंकड़ जितना भी, हम गम सहना ही भूल गए,
हुआ करार था ये कि वो हमें छुएगा और हम ढह जायेंगे,
उसने छुआ सौ-सौ बार हमें, और हम ढहना ही भूल गए ,
सहरा पर खड़े मुन्तज़िर थे, और हम दरिया सा बहने वाले थे,
हम कुछ यूँ उलझे अपने में ही कि हम बहना ही भूल गए, 
नीड़ का तिनका-तिनका जोड़ा, और सारा जीवन बीत गया,
वक़्त जो आया रहने का, तो हम रहना ही भूल गए ,

तुम्हारा-- अनंत 


1 टिप्पणी:

Rajesh Kumari ने कहा…

vaah ...lajabaab likha hai.