बुधवार, फ़रवरी 15, 2012

ऐ जिन्दगी जरा अहिस्ते चल...

ऐ जिन्दगी जरा अहिस्ते चल,
कहीं दौड़ते-दौड़ते न दम निकल जाए,
सुकूँ  की तलाश चैन की चाहत में,
हम ये कहाँ बदहवासों के शहर चले आए,
सादगी खतरे में है हमारी,
डर है हमें कहीं हम भी न बदल जाएँ,
खतरनाक है सुबह यहाँ की शाम ज़ालिम है,
ये आदमखोर चौराहे,कहीं हमें भी न निगल जाएँ,
गर्मी तेज हैं यहाँ दौलत की, इंसान पिघलते हैं,
कहीं ऐसा न हो कि मेरे भीतर का भी आदमी पिघल जाए,
हर कोई डंक मरता है यहाँ सांप और बिछुओं की तरह,
बात करता नहीं कोई ऐसी कि दिल ये बहल जाए,
बड़ी ताजीब-ओ-सलीके से जीते है लोग यहाँ,
कभी उनका दिल नहीं करता कि बच्चों सा मचल जाएँ,
लौट आए हैं हम गाँव की झोपडी में ''अनंत'',
बड़ा मुश्किल है कि फिर लौट के शहर के महल जाएँ


तुम्हारा--अनंत 

5 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

http://urvija.parikalpnaa.com/2012/02/blog-post_16.html?spref=fb

vidya ने कहा…

वटवृक्ष से होते हुए आपके ब्लॉग तक पहुंची...
बेहतरीन संजीदा रचनाओं का खजाना पाया...

आपकी लेखनी कमाल की है..
शुभकामनाएँ.

कविता रावत ने कहा…

jindagi ke safar ko aasan karte rahne ki sundar koshish se bhari rachna..
sundar prastuti...bahut achha laga aapke blog par aakar...
haardik subhkamnayen!

सदा ने कहा…

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

anurag anant ने कहा…

आप सब सुधि पाठकों का धन्यवाद जो आपने मेरी रचनात्मकता को सराहा ..........धन्यवाद