रविवार, मई 08, 2016

एक नज़र से उसने हमारी जिंदगी तबाह की...!!

एक नज़र से उसने हमारी जिंदगी तबाह की
हमें नाज़ ये कि न हमने उफ़ की, न आह की

वो हमें लूटते रहे और हम मुसलसल लुटते रहे
न हमने खुद को बचाया, न खुद की परवाह की

क्या अज़ब बेरुखी थी क्या गज़ब जुल्म था
उसने न हमसे बातें की, न हमपे निगाह की

हम जिनके इश्क़ में ताउम्र शायरी करते रहे
उसने न हमें कभी दाद दी, न कभी वाह की

इश्क में उसको माना हमने अल-खुदा की तरह
पर न उससे कभी फ़रियाद की, न कभी चाह की

अनुराग अनंत

जो चला गया है जिस्त से बहुत पहले...!!

जो चला गया है जिस्त से बहुत पहले
मैं उसे न जाने कब से बुला रहा हूँ

ये तन्हाइयों की क्या अज़ब तीरगी है
कि जिसमे दिल अपना जला रहा हूँ

मेरे सब ख्वाब अब बच्चों से हो गए हैं
मैं उन्हें थपकियाँ दे दे कर सुला रहा हूँ

ये गज़ब प्यास है जो बुझती ही नहीं है
मैं रह रह कर उसकों आंसू पिला रहा हूँ

याद उसकी मेरा दिल लहू कर रही है
मैं जिगर चाक करके उसे भुला रहा हूँ

अनुराग अनंत

सच बोलने का जज्बा हम अपने अन्दर ले कर चलते हैं...!!

सच बोलने का जज्बा हम अपने अन्दर ले कर चलते हैं
हम वो पागल कतरे हैं जो दिल में समंदर ले कर चलते हैं

उनसे कह दो कि यहाँ हैं सर भी बहुत और बाजू भी बहुत
जो लाठी, झंडा, तलवार, खुखरी और खंजर ले कर चलते हैं

वो आंधी, तूफानों और काले कानूनों से हमें डरता फिरता है
उसे नहीं मालूम हम अपने संग में बवंडर ले कर चलते हैं

हम उन किसानों के बच्चे हैं जो फांसी के फंदों की भेट चढ़े
हम अपनी आँखों में अश्क नहीं, मौत के मंजर ले कर चलते हैं

वो ऐयारों के सरदार 56 इंच की छाती पर फूले नहीं समाते हैं
और हम हैं जो अपनी छाती पर सारा अम्बर ले कर चलते हैं

हम खून-पसीने, जीने-मरने वाले कब हद-ए-जिस्म में कैद रहे
हम अब तो दर-ए-मकतल को जिस्म ये जर्जर लेकर चलते हैं

अनुराग अनंत

शनिवार, अप्रैल 30, 2016

ये जुमलों की महारत है, कुछ और नहीं...!!

ऐ मेरे दिल-ए-नादां, तू यूं खुश न हो
ये जुमलों की महारत है, कुछ और नहीं

ये जो उनकी चटक सुनहली तकरीरें हैं
ये ख्वाबों की तिजारत है, कुछ और नहीं

वो हमें बस एकलव्य, सम्भूक समझते हैं
ये रामायण, महाभारत है, कुछ और नहीं

ये जो काले दस्तूर, ये जेलें, ये जिन्दानें हैं
ये हमसे उनकी हिकारत है, कुछ और नहीं

वो जो चाहें कहें इसे, उनकी अपनी मर्ज़ी है
ये तेरा-मेरा, हमारा भारत है, कुछ और नहीं

अनुराग अनंत

अपने एहसासों को रिश्तों का इल्जाम न दे....!!

अपने एहसासों को रिश्तों का इल्जाम न दे
उल्फत को यार अब और कोई नाम न दे

एक और प्याला मौत का सबब बन सकता है
साकी प्यासा ही रहने दे, हमें कोई जाम न दे

जिंदगी तूने हमें फकत धूप ही धूप बक्शी है
दोपहर ही रहने दे, मेरे हिस्से में शाम न दे

मैं जनता हूँ, कोई खबर अच्छी हो नहीं सकती
उससे कह दो वो हमें अब कोई पैगाम न दे

उनके इल्मी उजाले में क्या जला, क्या कहें
वो हमें अब गाफिल ही रहने दे, इल्हाम न दे

ये जिंदगी उसे याद करने में बीती है “अनंत”
या खुदा किसी और को अब ऐसा काम न दे

अनुराग अनंत

इस दर्द को बर्बाद कौन करे..!!

नाशाद ही रहने दो दिल को
इस दिल अब शाद कौन करे

ये दर्द मुझे उसका तोफा है
इस दर्द को बर्बाद कौन करे

मैं यादों का वाहिद कैदी हूँ
इन यादों से आजाद कौन करे

कातिल और मुंसिफ वो ही है
अब उससे फ़रियाद कौन करे

वो चाहे मैं खुद को क़त्ल करूँ
पर मुझको जल्लाद कौन करे

यहाँ साये दरख्त निगलते हैं
इस शहर को आबाद कौन करे

हरसू धूप ही धूप का कब्ज़ा है
इस धूप को शमशाद कौन करे

अनुराग अनंत

बुधवार, अप्रैल 06, 2016

हमने खुद को खूब बर्बाद किया

कुछ मेरी राहें भी दुश्वार रहीं
कुछ हमराही ने भी न साथ दिया

बस कुछ ऐसा सफ़र कटा मेरा
जैसे किसी ने नसों को काट लिया

वो जिससे मैंने कभी न जीतना चाहा
बस उसी ने अक्सार मुझको मात दिया

ये जिंदगी जैसे-तैसे बसर हुई मेरी
रात को दिन, दिन को रात किया

वो संगदिल, पत्थर का बना हुआ
उससे रोया, उससे फ़रियाद किया

संग उसके हम जो न आबाद हुए
हमने खुद को खूब बर्बाद किया

कोई पूछे जिंदगी में क्या हुआ अनंत
वो हमको भूले, हमने उनको याद किया

--अनुराग अनंत

सोमवार, अप्रैल 04, 2016

खाख आबाद रहूँ जब दिल आबाद ही नहीं रहा


एक उसकी याद है जो दर छोडती ही नहीं है
एक वो है जिसे हमारा दर याद ही नहीं रहा

न दिल जलेगा अब, न जिगर ही सुलगेगा 
अच्छा हुआ उल्फत का फसाद ही नहीं रहा

हसरत तो है फिर से हमें कोई कतल तो करे
पर यहाँ उस जैसा कोई जल्लाद ही नहीं रहा

क्या गाफिल बने ये दिल, क्या दिल की करे
तुझे मिलके ये दिल अब आज़ाद ही नहीं रहा

क्या शादगी, क्या नाशादगी सब एक सा लगे 
हद-ए-हासिल था जो वो शमशाद ही नहीं रहा

मुझमे क्या बचा है अब "अनंत" सब वीरान है
खाख आबाद रहूँ जब दिल आबाद ही नहीं रहा

अनुराग अनंत

रविवार, दिसंबर 06, 2015

मैं कुछ इस कदर बंजर हुआ कि बरसता रहा हूँ...!!

मंजिलों को रहगुजर मैं कहता रहा हूँ
दर्द थमता नहीं सो मैं चलता रहा हूँ

वो कोई और है जो उफ़क पर उगा है
मैं तो न जाने कब से ढलता रहा हूँ

ये दरिया मेरे आंसूओं से बना है
मैं रिसता रहा हूँ, पिघलता रहा हूँ

न सूरज, न चंदा, न तारा ही था मैं
महज एक चराग सा जलता रहा हूँ

वो न हसीं, न आंसू, न ख़ामोशी समझे
वो कभी मुझको समझें तरसता रहा हूँ

वो इतने सुलझे थे कि अब क्या कहूँ मैं
उनकी सुलझन में अक्सर उलझता रहा हूँ

वो जो जाते हुए मेरा सावन अपने संग ले गए हैं
मैं कुछ इस कदर बंजर हुआ कि बरसता रहा हूँ

तुम्हारा-अनंत 

तुम ही कहो इससे बड़ा इंकलाब क्या होगा...!!

अपने कातिल को ही सरदार कहना पड़ता है
हमें इससे बढ़कर और अज़ाब क्या होगा

हमने अपनी हथेलियों पे जान रक्खी है
तुम ही कहो इससे बड़ा इंकलाब क्या होगा

हमारे यहाँ तो चरागों ने ही रोशनी कर दी
तुम रखो अब तुम्हारा आफताब क्या होगा

सारी रात अँधेरे में बसर कर दी हमने
सुब्ह को लाए जो ये महताब क्या होगा

हमने तुम्हारी असली सूरत पहचान ली है
हटा दो चेहरे पर से अब ये नक़ाब क्या होगा

वो मंजर देखा है हमने कि अब सो न पाएंगे
जो नींद ही नहीं आनी तो फिर ख्वाब क्या होगा

उनकी बातें ही चमन के चेहरे बिगाड़ देतीं है
वो जो बोल पाएं तो फिर तेज़ाब क्या होगा

इन अदालतों से आस नहीं कि उसका इन्साफ करे
अब देखना ये है, या खुदा तेरा हिसाब क्या होगा

वो डराते हैं हमें कि कुछ ख़राब हो जायेगा "अनंत"
जो होना था हो गया ख़राब अब इससे ख़राब क्या होगा

तुम्हारा-अनंत

रविवार, नवंबर 29, 2015

कोई ख्वाब ऐसा दिखाया न जाए..!!

कोई ख्वाब ऐसा दिखाया न जाए
जो पूरा होने के काबिल न हो

ऐसे समंदर की रुसवाई तय है कि जिसकी
अपनी लहरें न हों, अपना साहिल न हो

दिल अपना लुटा करके हमने ये जाना
दिल उसको न देना, जिसको दिल ही न हो

साँसों के पैरों में एक अजब जंजीर है
और आप कहते हैं इस कदर बोझिल न हो

मैं उसे हर धड़कन में महसूस करने लगा हूँ
उसके दीदार में अब कोई झिलमिल न हो

ऐसी जिंदगी भी क्या जिंदगी है "अनंत"
जिस जिंदगी में कोई हसीं कातिल न हो

तुम्हारा-अनंत 

शनिवार, नवंबर 28, 2015

मैं इस कुछ कदर बेचैन हूँ कि बंजारा हो गया हूँ...!!

घायल है जो चप्पा-चप्पा, मैं वो नजारा हो गया हूँ
लोग कहते हैं अब मुझे, मैं आवारा हो गया हूँ

न मौजें, न रवानी, और न पानी ही बचा है
मैं बंजर समंदर का एक किनारा हो गया हूँ

उसकी जुदाई में हर घडी तन्हाई से बाबस्ता हैं
इस तल्ख़ तन्हाई में मैं खुद का सहारा हो गया हूँ

वही सबब-ए-बीमारी, वही चारागर है अब मेरा
उसके इश्क ने यूं मारा कि बेचारा हो गया हूँ

सुकूं मिल जाए तो ठहरूं किसी एक ठांव पे "अनंत"
मैं इस कुछ कदर बेचैन हूँ कि बंजारा हो गया हूँ

तुम्हारा-अनंत


शुक्रवार, नवंबर 20, 2015

वो क्या-क्या, किस-किस तरह से कहेंगे...!!

वो क्या-क्या, किस-किस तरह से कहेंगे
मैं जनता हूँ, जिस-जिस तरह से कहेंगे

शाह जी सच में, सच के सिवा सब कहेंगे
मैं जनता हूँ वो सच किस तरह से कहेंगे

उनकी मुहब्बत से महज नफ़रत उगेगी
मैं जनता हूँ वो मुहब्बत इस तरह से कहेंगे

तुम्हारी बर्बादियों में भी तुम्हे तरक्की दिखेगी
मैं जनता हूँ वो साजिशों को उस तरह से कहेंगे

तुम्हारा-अनंत

बुधवार, नवंबर 04, 2015

ये इश्क़ सफर कटता ही नहीं...!!

है एक खालीपन इस जीवन में
जो तुम मिल जाती तो भर जाता

मैं मझधारों के बीच भटकता हूँ
जो तुम होती पार उतार जाता

करते करते कर न सका जिसे
मैं वो काम जरूरी कर जाता

जो हांथों मे हांथ लिया होता
तो मैं भी चैन से मर जाता

न डरने की आदत खराब रही
काश मैं भी इश्क़ से डर जाता

ये इश्क़ सफर कटता ही नहीं
जो कट जाता तो घर जाता

या मौला किस मिट्टी का किया मुझे
काश मैं भी टूट बिखर जाता

तुम्हारा-अनंत

शुक्रवार, अक्तूबर 16, 2015

ये बेसब्र धड़कन, आवारा साँसें..!!

ये बेसब्र धड़कन, आवारा साँसें
जो छू लें तुमको तो करार आये

है तल्ख़ धूप का ये जो मौसम
खुदा करे न दिल पे दरार आये

उसके आने से दिल ज़ख़्मी हुआ है
या ! रब अब न कोई बहार आये

फकत उसके यहीं के खातिर
हम हँस के अपनी गर्दन उतर आये

कर के दागी हम अपना पहलु
उन्सका दमन निखार आये

तुम्हारा-अनंत


ये हाल जो हमारा हो गया है..!!

ये हाल जो हमारा हो गया है
ये हाल मोहब्बत ने ही किया है

हँसते-हँसते जो मर सका है
इस जहाँ में बस वो जिया है

हमें अब प्यास लगती नही है
हमने अपना आंसू पिया है

इससे बढ़कर अब क्या दे सकेंगे
हमने तुमको अपना दिल दिया है

कुछ आवारा परिंदे खूब रोये
लगता है कोई शज़र गिरा है

उससे इश्क का अब क्या सबूत लायें
मरते-मरते हमने उसका नाम लिया है

तुम्हारा अनंत

    

मंगलवार, अक्तूबर 13, 2015

क्या कहें कहने पर रुसवाई तो होगी..!!

क्या कहें कहने पर रुसवाई तो होगी
तुम्हे याद हमारी कभी आई तो होगी

कल हम तुम्हारा नाम लेकर मर गए हैं
ये बात तुम्हे हवाओं ने बताई तो होगी

वो ग़ज़ल जो हमने सिर्फ तुमपे लिखी थी
कभी तुमने भी अकेले में वो गाई तो होगी

हमने छुपाए हैं अपने सब दर्द तुमसे
तुमने भी कोई बात हमसे छिपाई तो होगी

शब-ए-फुरकत पे इन आँखों ने समंदर बहाया
तुम्हारी आँखों ने भी एक नदी बहाई तो होगी

तुम्हारी आवाज है इस दिल में अबतक बाकी
हमारी हँसी भी थोड़ी तुममे समाई तो होगी

तुम्हारा-अनंत 

रविवार, सितंबर 27, 2015

दिल से उठती आहों का असर पूछते हैं..!!


दिल से उठती आहों का असर पूछते हैं 
है मरने में कितनी कसर पूछते हैं

आँखों से घायल करके जिगर को 
है कैसा उनका ये हुनर पूछते हैं

जो जबरन मेरे तसव्वुर पर काबिज़ हुए हैं
है मुसलसल मुझे किसकी फिकर पूछते हैं

जो लोग बरसों से घर को लौटे नहीं हैं
मैं अब जाता नहीं क्यों घर पूछते हैं

बगबनों ने ही क्यों जड़ें कटीं "अनंत"
मरते हुए ये सवाल अब शज़र पूछते है

तुम्हारा- अनंत

सोमवार, सितंबर 21, 2015

जब से वो मेरे ख्वाब में आने लगी है !!

जब से वो मेरे ख्वाब में आने लगी है
मेरी तबियत रह रह के मुस्काने लगी है

साँसों को खबर ही नहीं है साजिशों की
धड़कन आजकल कुछ छिपाने लगी है

जिंदगी के मायने कुछ यूं बदलने लगे हैं
हम उसे, वो हमें जिंदगी बताने लगी है

इश्क़ की राह में अँधेरा ही रास आता है
अब हसरत खुद ही दिए बुझाने लगी है

इश्क़ ने सब कुछ यूं गुलाबी किया है
कि जिंदगी हमें पास बिठाने लगी है

ये शाम हुई "अनंत" कि क्या हुआ है
याद उसकी क्यों गुनगुनाने लगी है

तुम्हारा--अनंत

शनिवार, सितंबर 19, 2015

अँधेरे मुस्काते हैं, उदास उजाले हैं..!!

अँधेरे मुस्काते हैं, उदास उजाले हैं
हमने अपने आंसू बच्चों से पाले हैं

संसद कहती है वो हमारी संरक्षक है
जैसे कसाई बकरों के रखवाले हैं

हम सारा सहरा पैदल नाप के बैठे हैं
यकीं न हो तो देखो पाँव में छाले हैं

भूख से मरते मरते मंगुआ ने पूछा
साहेब अच्छे दिन कब आने वाले हैं

वो कहते हैं चुप रहो, मौत आ जाएगी
साहेब, जल्दी ही खिसियाने वाले हैं

सवालों की जद में उनका दम घुटता है
कुछ पूछने पर बस गरियाने वाले हैं

दंगे करवाना तो महज उनका शौक है बस
वर्ना वो तो चैन-ओ-अमन फ़ैलाने वाले है

जिनको लिखना था कलम बेंच कर बैठे हैं
जिनको कहना था उनके मुंह पर ताले हैं

सच कहने पर "अनंत" घर भी जल सकता है
इसलिए हमने अपने घर-बार खुद ही बाले हैं

तुम्हारा--अनंत

गुरुवार, जून 04, 2015

ए जिंदगी मैं खुद में बचा ही नहीं..

क्या बताएं क्या क्या नहीं करते
बस किसी से गिला नहीं करते

उसने छोड़ दिया हमें तो क्या
हम भी उससे मिला नहीं करते

ज़ख्म हैं तो फिर दिखने भी चाहिए
हम अपने ज़ख्म सिला नहीं करते

वो कहते है उडो आज़ाद हो तुम
पर बेड़ियों को ढीला नहीं करते

ए जिंदगी मैं खुद में बचा ही नहीं
इंसान को यूं भी छीला नहीं करते

---अनुराग अनंत

शुक्रवार, मई 29, 2015

एक उम्मीद ने दिल को मारा, एक उम्मीद पर दिल कायम है

एक उम्मीद ने दिल को मारा, एक उम्मीद पर दिल कायम है
हम अब और कुछ नहीं हैं अनंत, फ़क़त उम्मीद ही अब हम हैं

एक उम्मीद है जो हँसते हैं, एक उम्मीद है कि जो हम ख़ुशी हैं
एक उम्मीद में चश्म-तर है, एक उम्मीद है कि जिसका ग़म है

एक उम्मीद है कि बच हम निकलेंगे, उसके इश्क़ के सहरा से
एक उम्मीद हैं कि उसके बंजर दिल में कहीं कोई जमीं नम हैं

एक उम्मीद हैं वो जिन्दा है, एक उम्मीद है कि वो अब भी बोलेगा
एक उम्मीद है कि हम कह सकेंगे, हमरा दिल मर गया, ये भरम है

--अनुराग अनंत

शनिवार, मई 16, 2015

जिनकी पेशानियों पर खुद कातिल लिखा है

जिनकी पेशानियों पर खुद कातिल लिखा है
वो दूसरों की पेशानियों के निशां पढ़ रहे हैं

जिनसे न समझे गए हमारे जज्बात अबतक
वो ख़ामोशी में लिपटे हमारे अरमां पढ़ रहे हैं

तुम गुलाम हो, सर ख़म किये हुए जमीं पढ़ रहे हो
हम कलंदर है, सर तान कर आसमां पढ़ रहे हैं

इन बच्चों को सियासत का सबक मत पढ़ाइए
ये मासूम बच्चे अभी बाब-ए-इमां(1) पढ़ रहे हैं

मैं अपने हौसलों के संग तनहा ही चला था
पर मेरे मुद्दई मुझ तनहा को कारवां पढ़ रहे हैं

एक जमीं पर हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई लिखा हैं
दुनिया वाले उन जमीं को हिन्दोस्तां पढ़ रहे हैं

(1) इमान का अध्याय
--अनुराग अनंत

बुधवार, जनवरी 07, 2015

जख्मी सपनो की आहें जरा सुनाओ तो...!!

क्या हुआ तुम्हारे साथ जरा बताओ तो
जख्मी सपनो की आहें जरा सुनाओ तो

बहुत तीरगी है, बहुत अँधेरा छाया है 
जुगनू को जोड़ जोड़ खुर्शीद बनाओ तो

धुंएँ ने सारी की सारी बस्ती राख करी 
इस धुएं को तुम जरा आग लगाओ तो

वो आ जायेगा फिर से, मेरा यकीन करो 
पहले जैसा आज फिर से उसे बुलाओ तो

मैं हिमालय सा खड़ा हुआ हूँ न जाने कब से 
मुझको जरा दो घडी अपने पास बैठाओ तो

बादल ने गद्दारी की है, यहाँ सबकुछ सूखा है
तुम अपनी आँख फिर से जरा बरसाओ तो

दरिया को बड़ा गुमान है, अपनी मौजों पर 
तुम अपने दर्द का हिमालय जरा पिघलाओ तो

तुम क्यों काटों पर दर्द बिछा कर सोते हो
तुम्हारे पास ग़ज़ल है, इसे जरा बिछाओ तो

तुम्हारा गम भी हंस देगा साथ तुम्हारे ही 
अपने अश्कों पर तुम जरा मुस्काओ तो

मेरे भीतर का सुकरात बहुत मचलता है
कोई इसको भी थोडा सा जहर पिलाओ तो

ये ख़ामोशी की दीवारें, सब की सब टूटेंगी 
तुम एक बार हिम्मत करके चिल्लाओ तो

नंगा है सबकुछ, तुम्हारा सबकुछ बेपर्दा है
तुम अपनी रूह को जरा कुछ पहनाओ तो

दर्द तुम्हारे भीतर भीतर कुछ गाता है 
आहों के साज फिर आज बजाओ तो

बात जिगर से निकली लब पर अटकी है 
तुम बातों को मंजिल तक पहुँचाओ तो

तुमने गज़ब किया जो खुद को बेंच दिया 
अपने किये पर तुम थोडा पछताओ तो

मानेगें वो सब के सब जो तुमसे रूठे हैं
सच्चे दिल से एक बार उन्हें मनाओ तो

एक लाश तुम्हारे भीतर भीतर सडती है 
पाक सी कब्र खोद कर उसे दफनाओ तो

ग़ज़ल लिखी है "अनंत" तुम्हारे ही खातिर 
तुम तन्हाई की ताल पर इसको गाओ तो

--अनुराग अनंत

मंगलवार, जनवरी 06, 2015

बदनाम है हम यहाँ, हमें बदनाम रहने दो....!!

न बोलो तुम जुबां से,आँखों को कहने दो
बहता हूँ मैं भी, तुम भी खुद को बहने दो

एक अहसास है सीने में तुम्हारे भी मेरे भी
कोई नाम न दो इसको, इसे बेनाम रहने दो

ए नाम वालों तुमसे बस ये इल्तिजा है कि
बदनाम है हम यहाँ, हमें बदनाम रहने दो

बेकिनारा है दरिया, बिन साहिल है समंदर
कोई बांधों न इनपर बाँध, आर पार बहने दो

गिरी हैं जो तुम्हारी पलकें तो शाम तारी है
न उठाओ इनको कुछ देर और शाम रहने दो

छुड़ा कर हाँथ, वो ये कह कर, चली गयी
छेड़ो न मुझको अब और, घनश्याम रहें दो
--अनुराग अनंत

ये जिंदगी तो गम का सामान हुई जाती है

ये जिंदगी तो गम का सामान हुई जाती है
दरिया के दहाने पर रेगिस्तान हुई जाती है

सोचा था लिखूंगा ग़ज़ल रुखसारों की चमक पर
पर मेरी ग़ज़ल तो बेवा की मुस्कान हुई जाती है

तेरा हुस्न, तेरा इश्क़, तेरी चाहत सब के सब कातिल हैं
ये जिन्दगी तेरी मुहब्बत में अफगानिस्तान हुई जाती है

सुना है, लाल किले की आवाजों में मेरा जिक्र ही नहीं है
मेरे सवाल, मेरी कहानी विदर्भ का किसान हुई जाती है

एक बूँद जो छलक आई है, आँखों के समंदर से
बेचारी बाज़ार के सहरा में परेशान हुई जाती है

मेरी बोली में उर्दू और हिंदी दोनों महकती है "अनंत"
मेरी आवाज़ एक मुकम्मल हिन्दुस्तान हुई जाती है

अनुराग अनंत 

मंगलवार, दिसंबर 30, 2014

मैं एक ज़ंग में था और ज़ंग का सामान नहीं था..!!

उसे भुला कर जीना इतना भी आसान नहीं था
मैं एक ज़ंग में था और ज़ंग का सामान नहीं था

वो जो गया, मेरा सब कुछ साथ ले गया अपने
मेरे पास मेरी जमीं नहीं थी, मेरा आसमान नहीं था

उसका मिलना मेरे खातिर, एक परेशानी का सबब रहा
मैं पहले भी परेशान था, पर इतना भी परेशान नहीं था

अहले सियासत तूने मुझे नांदानियत का इल्म करा दिया
मैं जिसे नांदान समझता था, वो इतना भी नांदान नहीं था

दुनिया को दस्त में ले, जो जिंदगी भर बेलौस ही जीया
कलंदर था वो “अनंत”, उसे इस बात का गुमान नहीं था

अहले-आलम मुसलसल भरते रहे आह, मेरे ग़म-ओ-दर्द पर
कम्बखत एक शख्स भी, मेरे आंसुओं से अनजान नहीं था

--अनुराग अनंत

बुधवार, दिसंबर 24, 2014

देह को बेदी करके हमने, रूह का हवन किया है..!!

तुझे भुलाने को हमने क्या क्या जतन किया है
देह को बेदी करके हमने, रूह का हवन किया है

सांस-सांस मरघट बोला है, धड़कन में अवसाद हंसा है
जिन यादों ने मुझको मारा, उनको खुद में दफ़न किया है

तुझको ओढा था, तुझे बिछाया, पहरन, गहना तुझे बनाया
तेरे जाने के बाद हमने, दिल के सूनेपन को कफ़न किया है

तूने जब जब हम पर वार किया, हमने हंस कर टाल दिया है
ए कातिल तेरे हर वार का हमने, अपने दिल पर वरन किया है

अश्क हमारे बेबस ठहरे, कुछ कह न पाए, रह रह ढुलके
दर्द जो गहराया दिल में तो हमने उसको सुखन किया है

-अनुराग अनंत

या तो खुदा की रहमत थी, या फिर जीने का हुनर था..!!

ये उलझन, ये बेबसी, ये मसायल, ये तगाफुल
मैं सोचता हूँ तुमसे न मिला था, तभी बेहतर था

तुमने मिल के कुछ यूं छुआ कि खिजां हो गया मैं
तुम न थे जिंदगी में तो, मैं एक सब्ज शजर था

क्या दिया, क्या लिया तुमने, जो हिसाब करता हूँ
हर तरफ आवाज उठती है, वो एक बेसबब सफ़र था

गज़ब है कि तुम्हारे साथ रहे और बचे भी रहे अब तक
या तो खुदा की रहमत थी, या फिर जीने का हुनर था

तुम्हारी हर अदा, मोहब्बत, इश्क़-ओ- फिकर की बातें
अब समझ में आता है कि वो तो साजिशों का कहर था

यूं लुटते रहे तुमसे और निभाते भी रहे अब तक
रेशमी इश्क़ था तुमसे, ये उस रेशम का असर था

-अनुराग अनंत 

रविवार, मार्च 23, 2014

एक ख्वाब है !!

एक ख्वाब है जो मुझे कभी जीने नहीं देता
एक ख्वाब है जो मुझे कभी मरने नहीं देता 

डर कर जीता, तो वजीर-ए-निजाम हो सकता था 
न जाने क्या है भीतर, जो मुझे कभी डरने नहीं देता

ये वो सड़क है जहाँ बड़े-बड़े साहिब-ए-किरदार गिर पड़े 
जिन्दा है मेरा ईमान वो मुझे कभी गिरने नहीं देता 

समंदर के किनारे एक गरौंदा, जो बेख़ौफ़ खड़ा मिला 
एक बच्चे हंस कर कहा, मैं इसे कभी बिखरने नहीं देता

सियासत के बाज़ार में तेज़ाब बिकता रहा, बांटता रहा
ये तेज़ाब मोहब्बत को कभी सजने-सँवरने नहीं देता

चाहता तो वो भी है कि रहे घर-ओ-वतन में सुकून से
पर भूख का कहर उसे घर में कभी ठहरने नहीं देता.

तुम्हारा- अनंत

बुधवार, जुलाई 24, 2013

कुछ चंद लोग छाए हैं बहार की तरह..

कुछ चंद  लोग छाए हैं बहार की तरह
बहुत से लोग दफ़न हैं मजार की तरह

सजी है अदालत, मेरे क़त्ल का मुकादमा है
और मैं ही खड़ा हूँ, कटघरे में गुनाहगार की तरह

ए जिंदगी, तू मुझे मौत देगी, मैं जनता हूँ ये
पर मैं लड़ कर मारूंगा, एक सिपहसालार की तरह

जब-जब ज़रूरत पड़ी, तुमने मुझे निकाल लिया
मैं तुम्हारी म्यान में रहा सदा, तलवार की तरह

आज-कल मुझमे महज़ शोर बसता है
मेरे भीतर कुछ पनप रहा है बाज़ार की तरह

जब याद आती है उसकी,सच कहता हूँ मैं
ये दिल सुलग उठता है, अंगार की तरह

मेरे ख़्वाब मुझ तक अब आ नहीं पाते
रोटी की फिकर खड़ी है,दिवार की तरह

ये वक्त हमें क्या, मिटा पायेगा  "अनंत"
हम इसके दिल में बसे है,प्यार की तरह

तुम्हारा--अनंत

मंगलवार, मई 29, 2012

पुराने यारों की याद..............

जब पुराने यारों की याद आती है
इक अजीब सी कसक कसकसाती है

वो चौराहों का हो-हल्ला गूंज जाता है
 वो नुक्कड़ के मिश्रा की चाय याद आती है

कालेज की दीवारों पर लिखे हैं नाम अब तक
निकलता हूँ जब उधर से निगाहें दौड़ जातीं है

पुरानी डायरी के पन्नों पर लिखी मेरी गज़लों से
कालेज के बरामदे मे टहलते दोस्तों की आवाज़ आती है

खनकती है सुषमा और अनुश्री चहकती है
संदीप,भास्कर और अनंत की तिकड़ी मुसकुराती है

पहले तो चले आते थे मेरे यार, मेरे साथ घर तक
अब तो महज मेरे साथ मेरी तनहाई आती है

तुम्हारा--अनंत

एक अजब ज़ंग लड़ता हूँ,..........

मैं रात-ओ-दिन एक अजब ज़ंग लड़ता हूँ
मैं अपने लहू से अपनी गजल गढ़ता हूँ

वो बेवफा हो गया तो क्या हुआ ''अनंत''
मैं उसके खातिर अब तलक दिल मे वफा रखता हूँ

वो मिलता है तो मुँह पर दुआ और दिल मे मैल होती है
मैं जब भी मिलता है ,दिल आईने सा सफा रखता हूँ

शायद यही वजह है जो इस घाटे के दौर मे भी
मैं यारों की दौलत और मोहब्बत का नफ़ा रखता हूँ

जला है जब से नशेमान मेरा मैं नशे मे हूँ
अब हर वक़्त बस मैं इंसानियत का नशा रखता हूँ

तुम्हारा---अनंत

सच तो ये है .............

सच तो ये है कि हर कोई सच्चाई से डरता है
अंधेरी राहों पर आदमी परछाईं से डरता है

एक बेनाम से दुराहे पर खड़ा है हर कोई
एक तरफ मौत से डरता है, एक तरफ रुसवाई से डरता है

जो मुफलिस है ''अनंत'' और खुद्दार भी है
वो कुछ मांगन से पहले मनाही से डरता है

जवाब दे सकता है एक मजलूम भी सितमगर को
पर वो मजबूर अपने घर की तबाही से डरता है

खून बहता है जिसकी रगों मे, और जो जिंदा भी है
वो शेर की औलाद कब लड़ाई से डरता है

बेगुनाह और पाक -ओ- साफ है जो शक्स
रोज़-ए-हश्र पर वो कहाँ किसी की गवाही से डरता है

डरा सकता नहीं कोई सच्चों को दुनिया में
जो सच्चा इंसान है वो फकत खुदा की खुदाई से डरता है

तुम्हारा--अनंत 

उसका असर .....

उसका असर कुछ इस कदर हो गया है
कि असर का असर भी बेअसर हो गया है

इस लूटे हुए दिल को कोई दिल क्यों कहेगा
ये दिल तो एक उजड़ा शहर हो गया है

राहें और मंजिल जिसकी दोनों ही गुम हैं
वो मदमस्त राही बेफ़िकर हो गया है

जो समंदर की सोहबत में रह करके लौटा
वो थोड़ा सा साहिल, थोड़ा लहर हो गया है

ये बद्हवास ख्वाबों की दौड़ थमती नहीं क्यों
आज आदमी खुद एक सफ़र हो गया है

तुमने लालच से उसे ऐसा मैला किया है
कि जो पानी था अमृत, वो जहर हो गया है

 तुम्हारा--अनंत 

उसकी आँखों के मकतब मे.............

उसकी आँखों के मकतब मे  मोहब्बत पढ़ के आया हूँ
मैं कतरा हूँ दरिया का, सहरा से लड़ के आया हूँ

काटा था पर सैयाद ने कि उड़ न सकूँगा
जो उसने बुलया तो मैं उड़ के आया हूँ

एक डायरी मे रख कर, उसने मुझे गुलाब कर दिया
खोला जो किसी ने तो फूल से झड़ के आया हूँ

मैं एक सूखी  हुई पंखुरी हूँ, तो क्या हुआ, मुझे होंठों से लगा लो
कसम खुदा की मैं खुद को मोहब्बत से मढ़ के आया हूँ

एक हरा -भरा दरख्त था मैं किसी जमाने में
किसी ने मेरी छाँव यूं खींची कि  उखाड़ के आया हूँ

यूं तो कोई गरज न थी मुझे तुम्हारी महफिल मे आने की
पर क्या करू मैं तुम्हारी मोहब्बत मे पड़ के आया हूँ

तुमहरा--अनंत 

बुधवार, मई 02, 2012

कीमत..............

मेरे मकान पर पत्थर न मारो,
काँच की दीवार है, टूट जाएंगी,
कल छूटनी होगी जो गाड़ी साँसों की,
वो आज ही झटके से झूट जाएगी,
बड़ी तुनकमिजाज़ है शाम मेरी,
मत सताओ इसे ये रूठ जाएगी,
भरी है आँख की गगरी गम-ओ-अश्क से,
जरा आहिस्ते से छुओ इसे ये फूट  जाएगी,
मैं न रहूगा कल और न मेरी आवाज़ होगी
बस मेरी याद तेरे  दिल के कोने में सुगबुगायगी,
जताता हूँ मैं जो आज कीमत अपनी,
कल अपने आप तू खुद-ब-खुद समझ जाएगी,

तुमहरा --अनंत
  

मंगलवार, मई 01, 2012

हम शायरों की शायरी

नजाकत से पढ़ी जाए, नफासत से पढ़ी जाए
हम शायरों की शायरी,  शराफत से पढ़ी जाए

बगावत कर रही है मेरी नज़्म-ओ-गज़ल यारों
पसीने की ग़ज़ल को रुपयों में न तोला जाए

उनकी आँखों मे नमी है जिनके चूल्हे ठंडे हैं
चलो थोड़ी हमदर्दी की तपिश की जाए

चेहरों पर चस्पे हैं यहाँ कई-कई  चेहरे 
फरेबी चेहरों के असल चेहरे की नुमाईस की जाए

नेकी की राह पर बदी के खिलाफ
चलो साथ मिल कर लड़ाई की जाए

मौत पूछे जब किसे दूं पहले शहादत 
हर एक बन्दे की तरफ से पहल फरमाइश की जाए 

तुम्हारा --अनंत 

ग़ज़ल बन जाती है,

जब बैठता  कलम ले कर तेरी याद आती है,
मिलती है  कलम कागज़ से ग़ज़ल  बन  जाती है,
तेरी आँखों के सूरमे पर लिखता हूँ पहले,
फिर तेरी घटाओं जैसे बाल पर नज़र जाती है,
तेरे माथे का नूर पीता हूँ प्यासे की तरह,
फिर कलम रेंग कर  जिगर में उतर जाती है,
तेरे बदन पर फैली बर्फ की उजली चमक से,
 मेरी और कलम की आँख चौंधिया जाती है,
उतरता हूँ जब मैं तेरी नसों में अहिस्ते से,
एक कुआंरी अनछुई  लड़की की आवाज आती है,
बहता हूँ घडी दो घडी तेरे लहू  में घुल कर,
तेरे जिगर की धडकनों से मेरे दिल की फ़रियाद आती है,
बैठता हूँ कलम ले कर ग़ज़ल बन जाती है,
मिलती है कलम कागज़ से ग़ज़ल बन जाती है,

तुम्हारा--अनंत

रविवार, अप्रैल 29, 2012

आग की गली

आग की गली में बेफिक्र पागल
एक बूँद टहलती है फकीरों की तरह

जिसने महसूस की गरीबों की बिस्तर की चुभन
वो कहाँ  सो सका  है वजीरों की तरह

मोहब्बत हो गयी बगावत से, बागी हो गए थे जो
बाँधा था कफ़न सर पर सेहरों की तरह

जिन्हें पसंद है रेंग कर जीना जी रहे है वो
लड़े जो जुल्म से यारों मर गए शेरों की तरह

याद में उनकी जब कभी  चराग जलाता हूँ
सिर पर कोई हाँथ फेर देता है,  बुजुर्गों की तरह

महफूज हूँ मैं उनके सायों के तले
वो मुझे घेरे हुए हैं दीवारों की तरह

तुम्हारा-अनंत   
   
आग की गली में बेफिक्र पागल,
एक बूँद टहलती है फकीरों की तरह,
जिसने महसूस की गरीबों की बिस्तर की चुभन,
वो कहाँ  सो सका  है वजीरों की तरह,
मोहब्बत हो गयी बगावत से, बागी हो गए थे जो,
बाँधा था कफ़न सर पर सेहरों की तरह,
जिन्हें पसंद है रेंग कर जीना जी रहे है वो,
लड़े जो जुल्म से यारों मर गए शेरों की तरह,
याद में उनकी जब कभी  चराग जलाता हूँ,
सिर पर कोई हाँथ फेर देता है,  बुजुर्गों की तरह,
महफूज हूँ मैं उनके सायों के तले,
वो मुझे घेरे हुए हैं दीवारों की तरह,

तुम्हारा-अनंत   
   

तू मुझे नज़र आती है


aमेरे हर ख़्वाब में, तू मुझे नज़र आती है ,
एक पल हाँथ में होती है, दुसरे पर बिखर जाती है,
तड़पता हूँ मैं, रेगिस्तान में पड़ी मछली की तरह,
देखता हूँ तुझको तो तबियत संवर जाती है,
तेरा मुझको देखना भी हरारत भरी छुवन है,
तू देखती है जब नस-नस सिहर जाती है,
मैं चुरा लेता हूँ आँख, तुझे देख कर न जाने क्यों,
और तू भी मुझे देख कर यूँ ही गुज़र जाती है,
याद आती नहीं तुझको इस आवारा शायर की,
या फिर याद करती है और धीरे से बिसर जाती है,
तू साहिल है बेशक ठुकरा दे मुझे,मैं फिर आऊंगा,
लहर हूँ मैं, और लहर ही साहिल से करीब जाती है


तुम्हारा --अनंत   

गुरुवार, मार्च 29, 2012

कुछ अलग हो तो लगे, जिंदगी  जिन्दा है अभी,
कभी तो आए यहाँ, इतवार- सोमवार के बाद,
दम की दरकार है बहुत, बड़ा हौसला चाहिए,
कुछ नहीं बचता है दोस्त! बाज़ार के बाद,
उसकी लुटी अस्मत एक खबर ही तो है ,
कोई कुछ नहीं बोलेगा, अखबार के बाद ,
कोई कितना भी कायर हो वो लड़ जायेगा,
खून खौल उठता है, एक ललकार के बाद,
बड़ा नादाँ था मैं, जो न ये फ़लसफ़ा समझा,
फकत इंतज़ार ही मिलता है, इंतज़ार के बाद,
और भी जीत है  ''अनंत'' एक हार के बाद,
जिंदगी उठ खड़ी होती है हर वार के बाद,

तुम्हारा--अनंत

बुधवार, फ़रवरी 22, 2012

गला रुंधा हुआ हैं....

गला रुंधा हुआ हैं, आवाज़ दर्द में नहाई  हुई है,
मुझे बस इतना कहना है कि मेरे साथ बेवफाई हुई है,
आफसोस करूँ भी तो क्या करूँ, खाख-ए-दिल पर,
ये  आग-ए-मोहब्बत हमारी ही लगाईं हुई है,
उदास क्यों हूँ मैं, हर कोई मुझसे पूछता है,
इस उदासी के पीछे मैंने एक बात छिपाई हुई है,
बेफिकर हो जाए वो, जिसने मेरा दिल तोड़ा है,
मैंने उसका नाम न लेने की, कसम खाई हुई है,
जिस दिन  कहा उसने, हमें भूल जाओ ''अनंत''
बस उसी दिन से वो मेरे वास्ते पराई हुई है,
चलने दो मुझे वक़्त हो चला है, चलता हूँ मैं,
मुझे लेने को वो मुन्तजिर मौत आई हुई है ,

तुम्हारा-- अनंत

भूल गए.......

जिस्म मिला परिंदे का और हम उड़ना ही भूल गए,
जो करने आये थे यार यहाँ वो करना ही भूल गए,
सोचा था कह देंगे उसके मुंह पर, वो जुल्मी हैं,
पर देखा जब उसको तो कुछ कहना ही भूल गए,
पहले तो सह जाते थे, हम दर्द हिमालय के जितना,
पर अब कंकड़ जितना भी, हम गम सहना ही भूल गए,
हुआ करार था ये कि वो हमें छुएगा और हम ढह जायेंगे,
उसने छुआ सौ-सौ बार हमें, और हम ढहना ही भूल गए ,
सहरा पर खड़े मुन्तज़िर थे, और हम दरिया सा बहने वाले थे,
हम कुछ यूँ उलझे अपने में ही कि हम बहना ही भूल गए, 
नीड़ का तिनका-तिनका जोड़ा, और सारा जीवन बीत गया,
वक़्त जो आया रहने का, तो हम रहना ही भूल गए ,

तुम्हारा-- अनंत 


सोमवार, फ़रवरी 20, 2012

वो अरमान हैं मेरा ......

वो अरमान हैं मेरा जो मेरी आँखों में चमका,
ये अँधेरी राहों में कर देता है उजियारे,
खार चुभते हैं जब जब दर्द लिख देता हूँ,
लोग पढ़ते  हैं उसे समझते हैं गीत हमारे,
मायूसी में भी मायूस होने नहीं देता हौसला मेरा,
आँख बंद करता हूँ दिखा देता है मंजिल के नज़ारे,
लड़ाई जारी है बचपन से ही मेरी और परेशानियों की,
लड़े जिस्म-ओ-जाँ से दोनों, न वो हारी न हम हारे,
बस इतना कहते हैं की मंजिल तक पहुँच ही जाएँगे,
ठीक वैसे ही जैसे पहुँचती  हैं, लहर समंदर के किनारे,
गम-ओ-दर्द से लैस जिएँ तनहा, तो भी कोई गम नहीं,
चाह इतनी कि मरने के बाद भी न लोग हमकों बिसारे,

तुम्हारा--अनंत


चाहता हूँ दो घडी बैठूं सुकून से ......

चाहता हूँ मैं भी दो घडी बैठूं सुकून से,
पर क्या करूँ मोहलत नहीं मिलती जूनून से,
दौड़ता हूँ दिन-रात ख्व्बों के पीछे इस कदर,
कि पाँव मेरे सन गए हैं, मेरे खुद के खून से,
शहर की महफ़िलों में मुझे सिर्फ तन्हाई मिली,
कितना दूर चला आया हूँ, मैं अपने गाँव कि धूम से,
दूर से देखा था तो लगा, कि ये भीड़ काफी अच्छी है,
पर अब तंग आ चूका हूँ इस मशीनी हुजूम से,
लिए फिरते हैं दुनिया की  दौलत-ओ-शोहरत साथ अपने,
फिर भी लगते हैं ये लोग कितने महरूम से,
पढ़े लिखे इंसानों में एक मशीन पनप आई है,
एक मुद्दत से नहीं मिलें हैं,कहीं इंसान मासूम से,

तुम्हारा --अनंत





जब तुम याद आए....

छलकी बूँदें आँखों से, जब तुम याद आए,
आह!  भरी हमने, जब तुम याद आए,
महकीं यादों की गीली माटी रातों में,
बहकी हसरत मेरी,जब तुम याद आए,
बुलंद शोलों से झुलसे,चैन-ओ-सुकून के दरखत,
रात जग कर बिता दी हमने, जब तुम याद आए,
जा रहे थे दर-ए-खुदा,  इबादत के वास्ते,
कदम मुड़ गए मैखाने की ओर, जब तुम याद आए,
तेरे एहसास के दस्तक ने, हमें कुछ ऐसा बदला,
हम, हम न रहे यार, जब तुम याद आए,
दीवानों की तरह बेसबब गुजरे तेरी गली से,
दुनिया हँसी हम पर, जब तुम याद आए,


तुम्हारा--अनंत

बुधवार, फ़रवरी 15, 2012

ऐ जिन्दगी जरा अहिस्ते चल...

ऐ जिन्दगी जरा अहिस्ते चल,
कहीं दौड़ते-दौड़ते न दम निकल जाए,
सुकूँ  की तलाश चैन की चाहत में,
हम ये कहाँ बदहवासों के शहर चले आए,
सादगी खतरे में है हमारी,
डर है हमें कहीं हम भी न बदल जाएँ,
खतरनाक है सुबह यहाँ की शाम ज़ालिम है,
ये आदमखोर चौराहे,कहीं हमें भी न निगल जाएँ,
गर्मी तेज हैं यहाँ दौलत की, इंसान पिघलते हैं,
कहीं ऐसा न हो कि मेरे भीतर का भी आदमी पिघल जाए,
हर कोई डंक मरता है यहाँ सांप और बिछुओं की तरह,
बात करता नहीं कोई ऐसी कि दिल ये बहल जाए,
बड़ी ताजीब-ओ-सलीके से जीते है लोग यहाँ,
कभी उनका दिल नहीं करता कि बच्चों सा मचल जाएँ,
लौट आए हैं हम गाँव की झोपडी में ''अनंत'',
बड़ा मुश्किल है कि फिर लौट के शहर के महल जाएँ


तुम्हारा--अनंत 

शनिवार, नवंबर 12, 2011

तिरंगा लपेटा है ,

एक  इंसान साज़िस में मारा था.................................गाँव आया है ,

इस टूटी हुई चटाई पर कौन लेटा है ,
दर्द जिसका गहरा है ,घाव छोटा है ,
एक इंसान साज़िस में मारा था गाँव आया है ,
जिस्म पर जिसके कफ़न के जगह तिरंगा लपेटा है ,
आज कल एक अजब लड़ाई है मेरे वतन में  ,
एक ओर किसान बाप है ,एक ओर  जवान (सैनिक)बेटा है ,
क्यों हँसा रहे हो हमको हम रो पड़ेंगे ,
कैसे बताएं हमने इन आँखों में क्या-क्या समेटा है ,
एक हमारा पेट है जो भूख से ही भर जाता है ,
एक उनका पेट है जो सारा वतन खा कर भी भूखा है ,

तुम्हारा  -- अनंत

यकीन कैसे हो ,

हम जी रहे हैं इसका हमें यकीन कैसे हो ....................................
हम जी रहे हैं इसका हमें यकीन कैसे हो ,
आसमाँ ने आज तक पुछा नहीं ऐ जमीन कैसे हो ,
जिस इंसान ने खुद कभी गौरैया की पीरा झेली हो ,
वो इंसान फिर बाज सा कमीन कैसे हो ,
लग रहा है यार फिर चुनाव आया है , 
नेता जी पूछ रहे हैं रामदीन कैसे हो ,
जो लोग कम थे उन्हें कमतर बना करके ,
बेहतर लोग सोचते हैं बेहतरीन कैसे हों ,
ये शहर मशीनों का है जहाँ हम रहने आये हैं ,
अब तो रात दिन सोचते हैं कि मशीन कैसे हो ,
बना कर पुर्जा मेरे दिल को किसी मशीन में लगा दिया ,
अब हँसे कैसे ये लैब ये आँखें ग़मगीन  कैसे हो ,

तुम्हारा -- अनंत 

सोमवार, मई 16, 2011

सच्ची मोहब्बत

सच्ची मोहब्बत यूँ ही कहने-सुनने की चीज़ नहीं होती ,
ये वो चीज़ है ''अनंत ''जिसे दिल से समझना पड़ता है ,
गुमनामी है ,बदनामी है ,पागलपन और बदहवासी है ,
बस इन्ही  सब के साथ , दिन-रात रहना पड़ता है ,
एक बार मेरी ग़ज़ल को सीने से लगा कर तो देखो ,
तुम्हे एहसास होगा ,गम से ग़ज़ल गढ़ना पड़ता है ,
जब तुम समझती नहीं हो , मेरी आँखों की बात ,
मुझे मजबूरी में इन कागजों से कहना पड़ता है
 बरसात आती है जब  ,तूफ़ान साथ ले कर के ,
दरख्तों को गिरना पड़ता है ,घरों को ढहना पड़ता है ,
मोहब्बत एक ऐसा बेरहम मक़तल है ,जहाँ पर ,
जिसे जीने की चाहत में  ,हँस कर मरना पड़ता है ,
अरमानों के परिंदों का ,तुमने पर काट दिया  है ,
बेचारे परिंदों को ,बिना पर के  उड़ना पड़ता है ,
हाँ ये सच कहा तुमने की हम कोई शायर नहीं है ,
पर अश्कों को कहीं न कहीं तो  बहना पड़ता है ,

तुम्हारा --अनंत 

तुम्हारी और मेरी मुस्किल

तुम्हारी और मेरी मुस्किल, कोई नई नहीं है यार ,
अक्सर जिस्म जान को, समझ नहीं पाता ,
लाख उलझन को सुलझाने की कोशिश करो ,
जो दिल का उलझा है फिर, सुलझ नहीं पाता ,
यूँ ही खामोश नहीं हो जाता, मैं तेरे सामने , 
ढूंढता हूँ लब्ज़ पर लब्ज़ नहीं पाता ,
मेरे दीद के बादल तेरी याद में दिन रात बरसें  है ,
एक तेरी आँखों का सावन है, जो बरस नहीं पाता ,
हो वस्ल-ए-मौत तो ,खुदा से एक बात पूंछे हम ,
जिसे हम समझते हैं, वो क्यों हमे समझ नहीं पाता ,

तुम्हारा --अनंत  

रविवार, मई 15, 2011

पत्थर का शहर

चलो अँधेरा करो यारों कि अब उजालों से डर लगता है ,
कदम -दो - कदम चलना भी अब सफ़र लगता है ,
न करो रहमत , न हम पर रहम करो तुम ,
तुम्हारा रहम-ओ-करम ,अब हमें कहर लगता है ,
टुकड़े-टुकड़े में बँटी है ,जीते नहीं बनती ,
जिन्दगी का हर एक टुकड़ा कम्बख़त ज़हर लगता है ,
हम तो कांच के थे ,यहाँ आ कर फूट गए ,
ये तेरा शहर हमे ,पत्थर का शहर लगता है ,
जिसकी खबर में हम दुनियाँ कि खबर भूल गए ,
वो ख़बरदार मेरी खबर से बिलकुल बेख़बर लगता है ,
जो एक कदम भी न चला सफ़र में साथ ''अनंत ''
न जाने किसलिए  वो हमे  हमसफ़र लगता है , 

तुम्हारा -- अनंत 

मंगलवार, मई 10, 2011

जब से बिछड़े हैं हम उनसे ,

जब से बिछड़े हैं हम उनसे ,
हम कुछ खोए-खोए हैं ,
कोई अरमान-ए-दिल अब न  जगाए ,
वो बड़ी मुश्किल से सोए हैं ,
एक-एक शेर ज़ख्म है मेरे ,
ग़ज़ल के धागे में बड़ी आहिस्ते से पिरोए हैं ,
उनके हमारे इश्क की दास्ताँ है बस इतनी ,
वो हमारी मोहब्बत पर हँसे हैं  ,हम उनकी मोहब्बत पर रोए हैं ,
क्या कमाया अब तलक जिन्दगी में हमने ,
कुछ याद के मोती हैं जिसे दिल में सजोए हैं  ,
उनके प्यार ने हमको कुली बना दिया ''अनंत'' ,
उनकी यादों के सामान हमने दिन-रात ढोए हैं ,  
तुम्हारा --अनंत 

सोमवार, मई 02, 2011

हम क्यों कर हुए शायर ,

इश्क़ ने किस-किस को, क्या-क्या बना दिया ,
किसी को दरिया बना दिया ,किसी को सहरा बना दिया ,
जो लोग बढ़िया थे ,उनको  बद्त्तर बना दिया ,
जो लोग बद्त्तर थे ,उन्हें बढ़िया बना दिया ,
आँखें ले गया वो ,अपनी आंखों में फँसा कर , 
आँखें  होते हुए भी ,उसने हमे अंधा बना दिया , 
जलते हैं बेसबब ,बेदर्द वीराने में , तन्हाँ ही ,
उसकी आशिकी ने हमे ,बुझता दिया बना दिया ,
हम क्यों कर हुए शायर ,क्या हमसे  पूछते हो ,
बीमार -ए-इश्क़ थे बस  ,इसी बिमारी ने हमे शायर बना दिया ,
दास्ताँ क्या है हमारी '' अनंत '' बस इतना जान लो तुम ,
किसी को हमने मना किया ,किसी ने हमको मना किया ,
 तुम्हारा --अनंत  

मंगलवार, अप्रैल 19, 2011

मेरा कितना है ,तेरा कितना ,

इस सुबह में मेरे हिस्से का सवेरा कितना है ,
चराग बुझा कर देख लो, अँधेरा कितना है  ,
तेरे नाम पर तो दावे बहुत लोग करते हैं ,
दिल कहता है आजमा कर देख लूँ, तू  मेरा कितना है,
उस डेरे से उडा था ,इस डेरे पर है ,उस डेरे पर बैठेगा ,
खुदा जाने, इस परिंदे का ,डेरा कितना है ,
भागता हूँ रातो-दिन ,पर अब तक भाग नहीं पाया ,
कोई बतला दे उसकी यादों का ,ये  घेरा कितना है ,
गुनाह हुआ है मुहब्बत में ''अनंत ''तुझसे  भी ,मुझसे भी ,
न जाने इस गुनहा में कुसूर मेरा कितना है ,तेरा कितना ,
 ''तुम्हारा --अनंत '' 

रविवार, अप्रैल 17, 2011

मैं मान नही सकता

मनाना है मुझको तो मुहब्बत से मना लो तुम ,
दिखोगे आँख मुझको तो ,मैं मान नही सकता ,
तलवारें सर  काटती होंगी ,मैं मान सकता हूँ ,
तलवारें  इरादा -ओ -हौसला काटें  ,मैं मान नही सकता ,
दिल ने कह दिया तो कह दिया ,अब क्या कहना,क्या सुनना ,
दिल के अलवा किसी का कहा, मैं मान नही सकता ,
नासेह न जाने कितना कुछ समझाया था मुझको ,
पर मैने भी कह दिया, खुद को अजमाए बिना ,मैं मान नही सकता,
लागे हों लाख पहरे तो  लगे रहने दो अब  ''अनन्त'' 
उसके कूचे जाए बिना, मैं मान नहीं सकता ,
तुम्हारी आँखें हाँ कहती हैं,तुम्हारी जुबाँ न  कहती  हैं ,
सच्ची आँखों के आगे ,झूठी जुबाँ कि बात मैं,मान नही सकता,
तुम्हारा  --अनंत 

शुक्रवार, अप्रैल 15, 2011

वो शहर इलाहाबाद न होता !

मैं जीस्त के  सारे गम भूल जाता ,
गर वो मुझे अब तक याद  न होता ,
 मुस्कुरा ले  दिल ! ये कहता अपने दिल से मैं ,
गर दिल बेचारा ये, मेरा नाशाद न होता ,
ये दर्द की दौलत मुझे कैसी मिलती यार, 
गर मैं उसकी चाहत में, इस कदर बर्बाद न होता ,
बड़ा तल्ख़ था वो वक़्त, जिसने हमें शायर बनाया हैं, 
हम कायर हो गए होते, गर इरादा फौलाद न होता ,
बड़ी तरीके से मारा हैं, उसने हमें प्यार में अपने,
कौन मरता हंस करके ,गर वो यूँ हंसी जल्लाद न होता ,
कई भटके हुए आशिक बसे हैं,  इस अदब के जंगल में,
गर उन्हें मंजिल मिल गयी होती, ये जंगल आबाद न होता ,
एक शहर में दो संगम हो नहीं सकते ,
हमारा मिलन हो गया होता, गर वो शहर इलाहाबाद न होता ,
तुम्हारा --अनंत                                                         
                                                       

सोमवार, अप्रैल 11, 2011

हवाओं में बुत

मंजिलें एक हैं ,एक रास्ते  हैं ,
वो हमारे वास्ते हैं ,हम उनके वास्ते हैं ,
इन आँखों में फ़कत उनकी तश्वीर बसती है ,
हम हवाओं में भी  उनके  ही बुत तरासते हैं, 
वो खामोस हैं ,दुनिया को ये लग रहा है ,
दुनिया  को क्या पता ,वो हमे आँखों से पुकारते है ,
आँखों की चोरी तो इश्क में लाजमी  है ''अनंत ''
हम आँखें चुरा -चुरा ,कर एक दूजे को निहारते है ,
तुम्हारा -- अनंत


रविवार, मार्च 13, 2011

जिश्म पे घाव

तुम्हारा मुरझाया हुआ चेहरा ,तुम्हारी कहानी है ,
तुम्हारी आँखों में आँसूं नहीं, गंगा का पानी है ,
अपने जिश्म  पे घाव बड़े चाव से ढो रहे हो तुम ,
तुम कुछ कहते क्यों नहीं , मुझे बड़ी हैरानी है ,
गद्दार दरख्तों के साये में  बैठना गद्दारी है ,
बेमन हवाओं में सांस लेना ,बेमानी है ,
ये वक़्त नमाज़  का वक़्त है शायद ,
तभी तो सड़कें इतनी वीरानी है ,
जो बात अब तक अनकही थी अनसुनी थी ,
तुम सुनो न सुनों ,हमें तो सुनानी है ,
तुम्हारा --अनंत 

शनिवार, मार्च 12, 2011

सुलझा रहा हूँ

उसके उलझे बालों पर लिखी थी एक नज़्म ,
वो अब तक उलझी है ,सुलझा रहा हूँ ,
एक हवा सी आई ,याद जग गयी उसकी ,
मैं थपकियाँ दे -दे कर, उसे सुला रहा हूँ ,
कह गयी थी जाते वक़्त ,आवाज़ मत देना ,
वो चली गयी है ,और मैं उसे बुला रहा हूँ ,
एक उदास ग़ज़ल की आँखों में ,नमी के मिसरे ,
बिखरे हुए हैं ,और मैं उसे सजा रहा हूँ ,
जिस जगह बिछड़े थे हम ,ये उसी जगह पड़ा था ,
मैं टूटा हुआ दिल, झुनझुने सा बजा रहा हूँ ,
कुछ जलता हुआ सा है मेरे सीने में ,न जाने क्या है ?
मैं रो -रो कर , उसे अश्कों से बुझा रहा हूँ , 
जिंदगी आई ,ज़मीं पर बैठ गयी हंस कर ,
मैंने  कहा ,अरे रुको मैं अपनी जाँ बिछा रहा हूँ ,
बहुत खोल दिया मैंने खुद को ,तुम्हारे सामने ''अनंत''
न जाने तुम कौन हो मेरे ,जो मैं  राज -ए- दिल बता रहा हूँ ,
''तुम्हारा --अनंत '' 







कल रात से

एक धुवाँ सा बैठा हुआ है मेरे भीतर, कल रात से ,
उठने का मन ही नहीं करता, मैं सोया हुआ हूँ, कल रात से , 
वो मिल गया था ,कल शाम चौराहे  पर , कुछ इस तरह,
कि उससे मिल कर, मैं खोया हुआ हूँ, कल रात से ,
वो जो चराग है ,जल रहा है ,कुछ वक़्त में बुझ जायेगा ,
क्या करे बेचारा अकेले ही  लड़ रहा है ,कल रात से ,
वो शायद  मोम था जिसे मैंने  गरमजोशी से छू दिया ,
लगातार वो मोम का पुतला पिघल रहा है, कल रात से ,
चाँद आवारा हो गया है ,घर पर रुकता ही नहीं ,
बस यहाँ -वहाँ ,जहाँ -तहाँ ,टहल रहा है, कल रात से ,
बरदास्त होता नहीं लगता है जाँ निकल जाएगी ,
एक अदना सा दर्द था जो बढ़ रहा है, कल रात से ,
माँ ने पायल बेंच कर एक किताब मुझे दिलाई है ,
आँखों में आंसू लिए मैं उसे पढ़ रहा हूँ ,कल रात से ,
तुम्हारा --अनंत

















गुरुवार, मार्च 10, 2011

जिन्दगी घाँस नोचती है

 किसी टीले पर अकेले बैठ कर सोंचती  है ,
जिन्दगी जब मायूस होती है तो घाँस नोचती है ,
पड़ती है  जब डांट सास की ससुराल में ,
माँ को याद करके बेटियाँ आंसू पोछती है ,
अँधेरी रात जब अँधेरे से परेशान हो जाती है ,
खुद घर से निकल कर जुगनूवों की टोलियाँ खोजती है,
तितलियाँ नादान हैं  ,मासूम हैं , पछ्ताएँगी ,
ये जो फरेबी फूलों का फरेबी रस चूसती हैं ,
बच्चें चले गए हैं परदेश ,क्या करें, अकेलें हैं ,
दो बूढी आँखें हैं  घर पर ,जो एक दूजे को देखती है ,
''अनंत'' उन बुजुर्गों की आँखों से फिर आंसू नहीं बहते ,
जिनकी  बहती आँखों को नन्हीं हथेलियाँ पोंछती है,
 तुम्हारा- -अनंत   
  

बुधवार, मार्च 09, 2011

चुप रहना पड़ता है

चुप रहो यहाँ पर ,चुप ही  रहना पड़ता है ,
जो न कहना चाहो वो भी हंस -हंस  कहना  पड़ता है ,
मुर्दों के शहर  में सब मुर्दे जिन्दा बन कर रहते है ,
 मुर्दों के बिच में रहना है ,तो मुर्दा बन कर रहना पड़ता है ,
हम  तो एक परिंदा हैं, हवा के संग उड़ जायेंगें ,
जिसे  परिंदा बनाना है ,हम जैसा उड़ना पड़ता है ,
बात कहने को तो हर कोई अक्सर  ही कह देता है ,
पर बात को, बात की तरह कहने को, हिम्मत करना पड़ता है ,
कौन उन्हें समझाए, जो एक बार गिरे, और टूट गए ,
गर सिर ऊंचा कर के चलना है ,तो गिर -गिर कर उठाना पड़ता है ,
 तुम्हारा --अनंत  

मंगलवार, मार्च 08, 2011

आदमी


वो जो आदमी नहीं है ,आदमी बने फिरते है ,
ये जो आदमी हैं, इन्हें लगता ही नहीं ,ये आदमी हैं ,
आज आदमी,आदमी से मतलब रखता नहीं ,
इन  आदमी जैसों को कैसे कहें ,कि ये आदमी है ,
आज इस  कदर बोझ है आदमी के कन्धों पर ,
कि आदमी ,आदमी हो कर भी, लगता नहीं कि आदमी है ,
एक आदमी को कल देखा था नाली से चावल बिनते हुए ,
मेरे भीतर के आदमी ने मुझसे पुछा, कि क्या ये आदमी है ,
एक पागाल के जख्म को एक कुत्ते ने चाट-चाट  कर ठीक कर दिया,
लोगों ने कहा ,क्या कुत्ता है ,मैंने कहा, क्या आदमी है 
हर एक आदमी एक अजब गफलत में है आज  ,
वो आदमी नहीं है ,फिर भी उसे लगता है, कि वो आदमी है ,
आदमियों कि भीड़ में, आदमी खोजता हूँ मैं ,
ये आदमी मुझे देख कर कहते है ,क्या अजीब आदमी है ,
जब कभी देखता हूँ ,किसी आदमी को, तो देखता हूँ, 
इस आदमी के भीतर भी क्या कोई आदमी है ,
खुद के दर्द पर तो हर कोई रोता है ''अनंत'' ,
जो गैंरों के दर्द पर रो पड़े बस वही आदमी है ,
तुम्हारा --अनंत