मंगलवार, मार्च 08, 2011

आदमी


वो जो आदमी नहीं है ,आदमी बने फिरते है ,
ये जो आदमी हैं, इन्हें लगता ही नहीं ,ये आदमी हैं ,
आज आदमी,आदमी से मतलब रखता नहीं ,
इन  आदमी जैसों को कैसे कहें ,कि ये आदमी है ,
आज इस  कदर बोझ है आदमी के कन्धों पर ,
कि आदमी ,आदमी हो कर भी, लगता नहीं कि आदमी है ,
एक आदमी को कल देखा था नाली से चावल बिनते हुए ,
मेरे भीतर के आदमी ने मुझसे पुछा, कि क्या ये आदमी है ,
एक पागाल के जख्म को एक कुत्ते ने चाट-चाट  कर ठीक कर दिया,
लोगों ने कहा ,क्या कुत्ता है ,मैंने कहा, क्या आदमी है 
हर एक आदमी एक अजब गफलत में है आज  ,
वो आदमी नहीं है ,फिर भी उसे लगता है, कि वो आदमी है ,
आदमियों कि भीड़ में, आदमी खोजता हूँ मैं ,
ये आदमी मुझे देख कर कहते है ,क्या अजीब आदमी है ,
जब कभी देखता हूँ ,किसी आदमी को, तो देखता हूँ, 
इस आदमी के भीतर भी क्या कोई आदमी है ,
खुद के दर्द पर तो हर कोई रोता है ''अनंत'' ,
जो गैंरों के दर्द पर रो पड़े बस वही आदमी है ,
तुम्हारा --अनंत


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