शनिवार, मार्च 12, 2011

सुलझा रहा हूँ

उसके उलझे बालों पर लिखी थी एक नज़्म ,
वो अब तक उलझी है ,सुलझा रहा हूँ ,
एक हवा सी आई ,याद जग गयी उसकी ,
मैं थपकियाँ दे -दे कर, उसे सुला रहा हूँ ,
कह गयी थी जाते वक़्त ,आवाज़ मत देना ,
वो चली गयी है ,और मैं उसे बुला रहा हूँ ,
एक उदास ग़ज़ल की आँखों में ,नमी के मिसरे ,
बिखरे हुए हैं ,और मैं उसे सजा रहा हूँ ,
जिस जगह बिछड़े थे हम ,ये उसी जगह पड़ा था ,
मैं टूटा हुआ दिल, झुनझुने सा बजा रहा हूँ ,
कुछ जलता हुआ सा है मेरे सीने में ,न जाने क्या है ?
मैं रो -रो कर , उसे अश्कों से बुझा रहा हूँ , 
जिंदगी आई ,ज़मीं पर बैठ गयी हंस कर ,
मैंने  कहा ,अरे रुको मैं अपनी जाँ बिछा रहा हूँ ,
बहुत खोल दिया मैंने खुद को ,तुम्हारे सामने ''अनंत''
न जाने तुम कौन हो मेरे ,जो मैं  राज -ए- दिल बता रहा हूँ ,
''तुम्हारा --अनंत '' 







1 टिप्पणी:

sandip!!singh ने कहा…

amazing..............ek din chaand khud dharti par aayega.......tumahre liye.